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श्रद्धांजलि: सैफ, वरुण और आयुष्मान परवेज भाई के लिए 'शेर बच्चे' थे

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श्रीराम राघवन और परवेज खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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परवेज भाई,
मेरी टीम के एक अनमोल साथी थे परवेज भाई। हमने चार फिल्मों में साथ काम किया।
परवेज भाई की तमाम खूबियों में से एक ये भी रही कि वह अभिनेताओं को बहुत सहज रखते थे, फिर चाहे वह पहली बार फिल्म कर रहे नील हों, तबू हों या फिर धर्मेंद्र जैसा अनुभवी सितारा। वह इन लोगों के भीतर खतरनाक टाइप के स्टंट बिना डरे और सुरक्षित तरीके से खुद करने की ऊर्जा भर देते थे। सैफ, वरुण और आयुष्मान सब उनके साथ खूब हिलमिल गए थे। ये सब परवेज़ भाई के लिए ‘शेर बच्चे’ थे। स्टंट के दौरान कलाकारों का हौसला बढ़ाने का ये उनका अपना तरीका था। उनके भीतर कहीं न कहीं एक अभिनेता भी सांसें लेता था और उन्होंने फिल्म जॉनी गद्दार में एक छोटा सा किरदार भी निभाया था।


जॉनी गद्दार एक कम बजट में बनी फिल्म थी और मैं चाहता था कि इसके एक्शन सीन्स फिल्मी या अतिरंजित न लगकर बिल्कुल असली जैसे लगें। फिल्म का एक बहुत महत्वपूर्ण एक्शन सीक्वंस एक चलती ट्रेन में फिल्माया गया। पहली बार फिल्म कर रहे नील नितिन मुकेश का किरदार विक्रम इसमें मास्क पहनता है और अपने से बेहतर कद काठी के साथी शिवा को क्लोरोफॉर्म सुंघाकर बेहोश करना चाहता है। शिवा का किरदार यहां सीआईडी वाले दया शेट्टी ने किया। ये तकरीबन 10 मिनट लंबा सीक्वंस है, जिसमें न तो कोई संवाद है और न ही कोई संगीत। और, ये एक चलती ट्रेन पर फिल्माया गया। मुझे अब भी जुहू, मुंबई के चंदन सिनेमा में ये सीन देखते हुए सैकड़ों दर्शकों के दिलों का उस वक्त एक साथ धक से रह जाना याद है, जब इस फाइट के बीच में शिवा एकाएक गिरता है और उसका सिर स्टील बेसिन से टकरा जाता है।

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अंधाधुन के सेट पर श्रीराम राघवन और परवेज खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हमारा साथ में काम करने का तरीका कुछ ऐसा था कि मैं उन्हें सीन की कहानी सुनाता और वह अपनी टीम के फाइटर्स व सहायकों को इकट्ठा कर पूरे सीक्वंस का खाका तैयार कर लेते थे। फिर वह इसे हम सबको रीयल टाइम में करके दिखाते और फिर स्लो मोशन में भी। ऐसा इसलिए ताकि अगर हमें कहीं कुछ बदलाव जरूरी लगते हों तो हम बता सकें। वह ये बखूबी समझते थे कि कहानी के जो पात्र हैं, वे ‘लड़ाका’ नहीं हैं और ना ही स्टंटमैन हैं, इसलिए वह ये पक्का करते थे कि एक्शन ऐसा हो जिसे परदे पर देख लोग मुतमईन हो सकें।

बदलापुर में उन्होंने हमें फिल्म का वह ओपनिंग सीक्वंस डिजाइन करने में मदद की जिसमें बैंक डकैती होती है और जिसके बाद एक कार चेज के दौरान बच्चा एक चलती कार से गिरता है और उसकी मां की गोली लगने से मौत हो जाती है।

बदलापुर में जेल से भागने का एक सीक्वंस बहुत निर्णायक था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि फिल्म देख रहे लोग नवाज के किरदार के उम्रदराज होने की बात समझ पाएं और ये भी कि हम दरअसल समय संक्रमण का सीन शूट कर रहे हैं। तो मैंने उन्हें समझाया कि जब तक हम इस समयातंरण का खुलासा न कर दें, हमें पूरा सीक्वंस लॉन्ग शॉट्स में ही शूट करना है।





एजेंट विनोद में मैंने कई एक्शन मास्टरों के साथ काम किया लेकिन इस फिल्म में मेरा फेवरिट सीक्वंस वो है जिसमें सैफ और एक बदमाश की आमने सामने ‘हैंड टू हैंड’ भिड़ंत होती है, इसमें एक और ऐसी ही भिड़ंत इंटरकट्स में चलती है जो इन दोनों के बीच अतीत में हो चुकी है। हम लोगों ने इस सीक्वंस की शूटिंग के दौरान इसकी बीट और इसकी गति को बिल्कुल ठीक ठीक लय तक लाने में खूब आनंद उठाया।



अंधाधुन आखिरी फिल्म थी, जिसमें हमने साथ काम किया। चुनौती यहां ये थी कि इसमें एक दृष्टिहीन व्यक्ति के लिए एक्शन डिजाइन करना था और ये भी ध्यान रखना था कि ये किरदार ‘डेयरडेविल’ (मार्वेल सीरीज का एक किरदार) न लगने लगे। मुझे याद है वह सीक्वंस जिसमें तबू को बुजुर्ग महिला को बालकनी से नीचे फेंकना था और वह बेहद डरी हुई थीं। हालांकि इसके लिए उन बुजुर्ग महिला का सीन करने के लिए एक स्टंट डबल थी जिसने विग पहना हुआ था, सुरक्षा के लिए जाल बिछे थे, रैम्प वगैरह सब अपनी जगह पर चाक चौबंद थे, लेकिन हमें समझ आ रहा था कि तबू इस सीन को करते हुए कितनी घबराई हुई थीं।
उन्होंने पूछा, “कैसे करूं मैं इसको?”
‘जस्ट पिक एंड थ्रो’ (बस उठाओ और फेंक दो), परवेज़ खान का सीधा सपाट उत्तर था।
उनकी ऊंची आवाज और उनका पूरी गर्मजोशी के साथ मजबूती से हाथ मिलाना मुझे हमेशा याद रहेगा।

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पूजा लाढा सुरती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म की एडिटिंग के दौरान मैं हमेशा एक्शन सीक्वंस में पायलट साउंड से ही क्यू लेती रही हूं और सीन के आखिरी वर्जन तक जो भी इस प्रक्रिया को देखता, उसे लोकेशन पर मास्टरजी के इस्तेमाल किए शब्द सुनाई देते रहते जिसमें वह जोश में चिल्ला रहे होते, कलाकारों के भीतर दम भर रहे होते और उन्हें अपना बेस्ट देने के लिए उकसा रहे होते। सीन की शूटिंग के दौरान उनकी रनिंग कमेंट्री जिसमें कई बार वह गालियां भी दे रहे होते थे, काफी असरदार होती थी। परवेज भाई एक बहुत ही सज्जन इंसान थे। ना तो कभी मुझे और ना ही सेट पर काम करने वाली दूसरी लड़कियों को उनके या उनकी टीम के साथ काम करने के दौरान असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने हमेशा हमारे साथ पूरी शिष्टता बरती और उनकी टीम ने हमेशा उनका अनुकरण किया।
अलविदा, परवेज़!

पूजा लाढा सुरती, फिल्म एडिटर

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