हिंदी फिल्मों में मां के चेहरे बदलते रहे हैं। हर दौर की अपनी एक अलग मां रही है। अमर उजाला ने 'मदर्स डे' पर फिल्मों में मां के बदलते चेहरों पर डाली एक नजर।
फिल्मों में मां समय और समाज की जररूत के मुताबिक पर्दे पर दिखीं। आपको कई ऐसी हिंदी फिल्में याद होंगी जिसमें बिस्तर में पड़ी बीमार मां के बगल मेज रखी होती है। और उस मेज में दवाईयों की रंग-बिरंगी शीशियां। या फिर ऐसी मां जो धुंआ से भरे चूल्हे को खांस-खांसकर फूक रही होती है। फिल्मों में मां ऐसी भी रही हैं जिन्होंने अपने बेटे को कुछ करने का जज्बा दिया और मां की बात ही हीरो के लिए प्रेरणा बनीं।
'मदर इंडिया' फिल्म की मां 'बेटा' की मां से बिल्कुल अलग है। 'दीवार' फिल्म की मां, कभी खुशी कभी गम की मां से बिल्कुल जुदा। समाज बदलने के साथ फिल्मों में मां के किरदार में भी बदलाव आया है। आज की फिल्मों की कहानी की धुरी भले ही मां के इर्द-गिर्द न घूम रही हो लेकिन बीच-बीच में कई फिल्में ऐसी आ जाती हैं जिनमें मां की भूमिका फिल्म के ट्रैक को तय करती है। आइए नजर डालते हैं हिंदी फिल्मों की कुछ ऐसी मां के किरदारों पर जो आज तक लोगों के जेहन में हैं।
'मुगले-आजम' में बाप -बेटे के बीच पिसती मां
'मुगले-आजम' एक तरह से बाप और बेटे के टकराव की कहानी है। इस टकराव में जीत और हार किसी की भी हो नुकसान मां का होता है। फिल्म में दुर्गा खोटे ने अकबर की पत्नी जोधाबाई का किरदार निभाया। हिंदी फिल्मों के इतिहास में वह सीन हमेशा याद रखा जाएगा जब अकबर अपने ही बेटे से युद्घ करने के लिए निकल रहे हैं और जोधाबाई उनकी आरती उतारकर उनकी जीत और सलातम होने की दुआ कर रही होती हैं।
'मदर इंडिया' की मां फिल्म की नायक
'मदर इंडिया' की पूरी कहानी ही मां के बदले के इर्द-गिर्द घूमती है। उस दौर में नायिका की भूमिका कर रहीं नर्गिस ने उस फिल्म के लिए मां का रोल इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि मदर इंडिया में मां का किरदार हीरो से कहीं ज्यादा ताकतवर होता है। फिल्म के दोनों हीरो सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार दरअसल मां के अपमान के लिए ही जी रहे होते हैं। फिल्म में मां द्वारा अपने बेटे को गोली मारने का सीन हिंदी फिल्मों के ट्रेंड बदलने वाले दृश्यों में शुमार किया जाता है।
"मेरे पास मां है"
'दीवार' फिल्म में निरूपमा रॉय की सशक्कत भूमिका है। निरूपमा रॉय ने लगभग 400 फिल्में कीं और ज्यादातर में उनकी भूमिका मां की ही रही। 'दीवार' फिल्म अपने उन दो डायलॉग्स की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में रही जिसमें मां का जिक्र है। शशि कपूर द्वारा बोला गया डायलॉग मेरे पास मां है के अलावा अमिताभ बच्चन की यह कहना कि जाओ पहले उस आदमी से साइन लेकर आओ जिसमे मेरी मां को गाली देकर नौकरी से निकाला था।"
'बेटा' में खुराफात करती मां
बेटा फिल्म में मां का किरदार निगेटिव था। यह अलग तरह की मां थी। दर्शकों ने अपने ही बेटे के खिलाफ साजिश रचती मां को पहली बार देखा था। मां के रूप अरूणा ईरानी की वह भूमिका आज भी याद रखी जाती है। यह उस किरदार का ही प्रभाव था कि बेटा के बाद अरुणा ईरानी पर्दे पर एक खलनायिका के रूप स्थापित हुईं।
'देवदास' की प्रतिक्रियावादी मां
संजय लीला भंसाली की 'देवदास' में किरण खेर ने पारो की मां का किरदार निभाया। फिल्म का वह दृश्य दर्शकों को आज भी याद है जिसमें किरण खेर, देवदास के घर में हो रही बर्बादी पर शंख बजाती हैं। साथ ही वह डायलॉग भी जिसमें वह देवदास की मां बनीं मौसमी चटर्जी से कहती हैं "यदि सात दिनों के अंदर अपने बेटी की शादी तुमसे ऊंचे खानदान में न की तो आठवें दिन बिन बुलावे मेरी मय्यत पर आ जाना"
फिर सहयोगी हो गयी मां
90 के दशक में मां सहयोगी हो गयी। फरीदा जलाल और मौसमी चटर्जी के किरदार हमेशा से ही बच्चों की मदद करने वाले रहे हैं। दिलवाले दुल्हिनयां ले जाएंगे में फरीदा ने काजोल की मां का रोल निभाया। शाहरुख खान और काजोल को मिलवाने में मां बनीं फरीदा जलाल की ही तरकीबें होती हैं। इस फिल्म के अलावा भी फरीदा ने कई फिल्मों में एक अच्छी मां का रोल निभाया।
कभी विद्रोही तो कभी समझदार मां
वक्त बदलने के साथ मां भी बदली। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का दूसरा पार्ट याद कीजिए। नवाजुद्दीन की मां का किरदार निभा रहीं ऋचा चड्ढा अपने बेटों को अपने दुश्मनों को मारने के लिए उकसाती हैं। यह कुछ-कुछ फिल्म 'करन-अर्जुन' में राखी जैसी ही भूमिका थी।
हाल की फिल्मों में पर्दे पर सशक्कत मां का रोल इमरान खान की डेब्यू फिल्म 'जाने तू या जाने न' में दिखता है। इमरान की मां बनीं रत्ना पाठक शाह ने ऐसी बोल्ड महिला का किरदार निभाया जिसका पति मर चुका है।
अब दोस्त बनीं मां
पर्दे पर मां अब दोस्त बन चुकी है। इसी मई में रिलीज हुई फिल्म 'गिप्पी' में मां बनीं दिब्या दत्त अपनी 14 साल की बेटी को ब्वॉयफ्रेड के साथ डेट पर जाने के लिए तैयार करती हैं। मां के बदलते स्वरूप का कुछ ऐसा ही किस्सा एक के बाद एक कई फिल्मों में दोहराया तिहराया जा रहा है।
'इंगलिश-विंगलिश' में मां बनीं श्रीदेवी का अंदाज भी मां के पारंपरिक रूप से बिल्कुल अलग है। 'कभी खुशी कभी गम' में जया बच्चन और 'फैमिली' में मां बनी काजोल भी हिंदी फिल्मों की पारंपरिक मांओं से अलग हैं।