कलाकार से सिनेमाई जादूगर तक का सफर
30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्मे दादासाहेब फाल्के का बचपन से ही कला के प्रति गहरा लगाव था। उनके पिता गोविंद सदाशिव एक संस्कृत विद्वान और पुजारी थे, जो सात बच्चों के परिवार को पालते थे। दादासाहेब ने 1885 में मुंबई के मशहूर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया, जहां उन्होंने चित्रकला, फोटोग्राफी और लिथोग्राफी सीखी। बाद में बड़ौदा के कला भवन में उन्होंने मूर्तिकला, इंजीनियरिंग, पेंटिंग और आर्किटेक्चर का अध्ययन किया।
करियर की शुरुआत में दादासाहेब ने कई क्षेत्रों में हाथ आजमाया। वह बड़ौदा में पेंटर रहे, फिर गोधरा में फोटोग्राफर बने, लेकिन बाद में उन्होंने फोटोग्राफी छोड़ दी। इसके बाद वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में ड्राफ्ट्समैन बने, लेकिन नौकरी में मन नहीं लगा। 1908 में उन्होंने मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा की लिथोग्राफी प्रेस में काम किया, जहां हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों ने उन्हें गहरे प्रभावित किया। बाद में उन्होंने अपनी प्रिंटिंग प्रेस शुरू की, लेकिन साझेदारों से मतभेद के कारण वह भी बंद हो गई।
पहली फिल्म का सपना
दादासाहेब का जीवन तब बदला, जब 1911 में उन्होंने एक मूक फिल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ देखी। यह फ्रांसीसी फिल्म उनके लिए जादू से कम नहीं थी। उन्होंने इसे बार-बार देखा और सोचा, 'अगर ईसाई धर्म की कहानियां पर्दे पर आ सकती हैं तो हिंदू देवी-देवताओं की कहानियां क्यों नहीं?' इस प्रेरणा ने उन्हें भारतीय संस्कृति को सिनेमा के जरिए दुनिया तक ले जाने का सपना दिया। उन्होंने फैसला किया कि वह भारत की पहली फीचर फिल्म बनाएंगे।
हालांकि, यह सफर आसान नहीं था। उस समय भारत में फिल्म निर्माण की कोई सुविधा नहीं थी। न स्टूडियो, न प्रशिक्षित अभिनेता, न तकनीकी संसाधन। दादासाहेब ने हिम्मत नहीं हारी। 1912 में वह लंदन गए और वहां मशहूर फिल्ममेकर सेसिल हेपवर्थ से दोस्ती की और उनसे फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। उन्होंने वहां से विलियमसन कैमरा, प्रिंटिंग मशीन, परफोरेटर और रॉ फिल्म खरीदी। भारत लौटकर उन्होंने ‘फाल्के फिल्म्स कंपनी’ की स्थापना की और अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ पर काम शुरू किया।
‘राजा हरिश्चंद्र’ को बनाने में आईं ये चुनौतियां
‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाना दादासाहेब के लिए किसी युद्ध से कम नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी फंडिंग। उन्होंने अपनी पत्नी सरस्वतीबाई के गहने गिरवी रखे, जीवन बीमा पॉलिसी बेची और दोस्तों से उधार लिया। फिल्म का बजट करीब 15,000 रुपये था, जो उस समय बड़ी रकम थी। दूसरी समस्या थी अभिनेताओं की। अभिनय को उस समय सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था, खासकर महिलाओं के लिए। अंततः उन्हें रानी तारामती के किरदार के लिए कोई महिला नहीं मिली। मजबूरी में उन्होंने एक रेस्तरां में काम करने वाले कुक अन्ना सालुंके को तारामती की भूमिका दी।
राजा हरिश्चंद्र का किरदार दत्तात्रय दामोदर दबके ने निभाया, जबकि उनके सात साल के बेटे भालचंद्र फाल्के ने उनके बेटे रोहिदास की भूमिका निभाई। दादासाहेब ने खुद स्क्रिप्ट लिखी, निर्देशन किया, सेट डिजाइन किया, मेकअप से लेकर एडिटिंग तक सब संभाला। उनकी पत्नी सरस्वतीबाई ने अभिनेताओं के कपड़े डिजाइन किए, खाना बनाया और पोस्टर तैयार किए।
‘राजा हरिश्चंद्र’ की ऐतिहासिक सफलता
21 अप्रैल 1913 को ‘राजा हरिश्चंद्र’ का प्रीमियर मुंबई के ओलंपिया थिएटर में शहर के रईसों के लिए हुआ। 3 मई 1913 को इसे कोरोनेशन सिनेमा, गिरगांव में आम जनता के लिए रिलीज किया गया। फिल्म ने दर्शकों का दिल जीत लिया। सत्य और धर्म के लिए सब कुछ त्याग देने वाले राजा हरिश्चंद्र की कहानी ने लोगों को भावुक कर दिया। फिल्म 23 दिनों तक चली और 1914 में लंदन में भी दिखाई गई। इसकी सफलता ने साबित कर दिया कि भारत में स्वदेशी कहानियों की फिल्में चल सकती हैं।
यह फिल्म भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर बनी। कुछ इतिहासकार दादासाहेब तोरणे की ‘श्री पुंडलिक’ (1912) को पहली भारतीय फिल्म मानते हैं, लेकिन वह एक स्टेज प्ले की रिकॉर्डिंग थी, जबकि ‘राजा हरिश्चंद्र’ पूरी तरह से स्वदेशी स्क्रिप्ट और सिनेमाई तकनीक वाली फीचर फिल्म थी।
सफलता के बाद नई उड़ान
‘राजा हरिश्चंद्र’ की सफलता के बाद दादासाहेब को निवेशक मिले। 1917 में उन्होंने पांच बिजनेसमैन के साथ ‘हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म्स कंपनी’ शुरू की। उनकी अगली फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913) में पहली बार एक महिला अभिनेत्री दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई को कास्ट किया गया, जो उस समय क्रांतिकारी कदम था। इसके बाद उन्होंने ‘लंका दहन’ (1917), ‘श्री कृष्ण जन्म’ (1918), ‘सत्यवान सावित्री’ (1914) और ‘कालिया मर्दन’ (1919) जैसी फिल्में बनाईं।
‘लंका दहन’ में अन्ना सालुंके ने राम और सीता दोनों की भूमिका निभाई, जो उस समय की तकनीकी उपलब्धि थी। दादासाहेब की बेटी मंदाकिनी फाल्के ने भी ‘लंका दहन’ और ‘श्री कृष्ण जन्म’ में काम किया। उनकी फिल्मों में पौराणिक कहानियां, स्पेशल इफेक्ट्स और ट्रिक फोटोग्राफी का इस्तेमाल दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। 1920 तक उनकी फिल्में बेहद लोकप्रिय थीं।
सिनेमाई संन्यास और टॉकीज का दौर
1920 में दादासाहेब ने रचनात्मक मतभेदों के कारण हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म्स कंपनी छोड़ दी और वाराणसी चले गए, जिसे उन्होंने ‘सिनेमाई संन्यास’ कहा। वहां उन्होंने एक सेमी-आत्मकथात्मक नाटक ‘रंगभूमि’ लिखा। बाद में वह नासिक लौटे और 1932 में अपनी आखिरी मूक फिल्म ‘सेतुबंधन’ बनाई, जिसे बाद में डबिंग के साथ रिलीज किया गया।
1930 के दशक में टॉकीज (ध्वनि वाली फिल्मों) का दौर शुरू हुआ। दादासाहेब मूक फिल्मों के जादूगर थे, लेकिन टॉकीज की तकनीक में ढल नहीं पाए। उनकी एकमात्र टॉकी फिल्म ‘गंगावतरण’ (1937) थी। इसके बाद वह फिल्म निर्माण से दूर हो गए। वह नासिक में सादगी से जीवन बिताने लगे। वृद्धावस्था और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण 16 फरवरी 1944 को उनका निधन हो गया।
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की शुरुआत
दादासाहेब फाल्के की वजह से आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है। उनकी याद में 1969 में भारत सरकार ने ‘दादासाहेब फाल्के पुरस्कार’ शुरू किया, जो सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान है। पहला पुरस्कार अभिनेत्री देविका रानी को मिला। 1971 में इंडिया पोस्ट ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।