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अब नहीं चलेगी मौलवियों और पुजारियों की

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केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने फैसला किया है कि वह धार्मिक संवेदनशील फिल्मों को प्रमाणपत्र देने के लिए पुजारियों और मौलवियों की सलाह से परहेज करेगा। सेंसर बोर्ड की चेयरमैन लीला सैमसन जल्द ही इस आशय का एक निर्देश जारी करने वाली हैं।
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ये फैसला ‘दोजखः इन सर्च ऑफ हेवेन’ नाम की हिंदी फिल्म को सेंसर प्रमाणपत्र जारी करने को लेकर हुए विवाद के बाद हुआ। हिंदी के चर्चित उपन्यास ‘दोजख’ पर आधारित इस फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट देने को लेकर सेंसर बोर्ड के सदस्यों में दो फाड़ हो गई थी।

फिल्म एक मुस्लिम पिता-पुत्र के रिश्तों की कहानी है, जिसे बनारस में शूट किया गया। फिल्म के निर्देशक जैगम इमाम उत्तर प्रदेश के चंदौली के रहने वाले हैं।

फिल्म की पहली स्क्रीनिंग के बाद इसे यह कहकर प्रमाणपत्र नहीं दिया गया कि फिल्म को सेंसर बोर्ड के मुस्लिम सदस्यों को दिखाना आवश्यक है।

दिखाना चाहते थे मौलवियों को

तब फिल्म रिवाइजिंग कमेटी में भेजी गई। कमेटी में फिल्म को हिंदू और मुस्लिम सदस्यों ने देखा लेकिन सर्टिफिकेट देने को लेकर गतिरोध कायम रहा। रिवाइजिंग कमेटी की प्रमुख प्रोफेसर नंदिनी सरदेसाई फिल्म को ‘यू’ प्रमाण पत्र देने के पक्ष में थीं लेकिन बोर्ड के दो सदस्य इसे मौलवियों को दिखाना चाहते थे।

मामले को तूल पकड़ता देखा सेंसर बोर्ड की चेयरपरसन लीला सैमसन को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने फिल्म के निर्माता-निर्देशक जैगम इमाम को चेन्नई में फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए बुलाया।

लीला सैमसन और चेन्नई के सेंसर सदस्यों ने फिल्म में कुछ भी अनुचित नहीं पाया और इसे ‘यू’ सर्टिफिकेट के लिए उपयुक्त करार दिया। पूरे मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए लीला सैमसन का कहना था कि वो आगे से इस बात का ध्यान रखेंगी कि फिल्मों को मौलवियों और पुजारियों को देखने की बात न कही जाए।

खड़ा होता है सेंसर पर प्रश्‍न?

सेंसर बोर्ड के सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वो फिल्मों का उचित मूल्यांकन करें और उपयुक्त प्रमाणपत्र दें। दूसरी ओर ‘दोजखः इन सर्च ऑफ हेवेन’ केनिर्माता-निर्देशक जैगम इमाम का कहना है कि पूरे मामले में जिस तरह से उन्हें परेशानी उठानी पड़ी वो सेंसर बोर्ड पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

बोर्ड को ऐसे सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो फिल्म जैसे कलात्मक माध्यम में मौलवियों और पुजारियों को लाने की बात करते हैं। हालांकि उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी कोशिशें सफल रहीं और बोर्ड ने उनकी फिल्म को बिना किसी कांट छांट के यू प्रमाणपत्र दिया। अब फिल्म जल्द ही सिनेमाघरों में नजर आएगी।
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होता रहा है विरोध

फिल्मों के मामले में सभी धर्म और पंथ हमेशा संवेदनशील रहे हैं। धार्मिक संगठनों के विरोध के कारण मुश्किलें उठाने वाली फिल्मों की सूची लंबी है। हिंदू संगठनों ने दीपा मेहता की वाटर से लेकर ओ माई गॉड का विरोध किया तो संजय लीला भंसाली की फिल्म का नाम ‘राम-लीला’ भी उन्हें पसंद नहीं आया।

तीन साल पहले कमल हासन की ‘विश्वरूपम’ पर मुस्लिमों ने आपत्ति की थी। 2005 में निर्देशक विनोद पांडे की फिल्म ‘सिन्स’ से लेकर हॉलीवुड की ‘दा विंची कोड’ तक का देश के कई ईसाई संगठनों ने जबर्दस्त विरोध किया था।
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