नया साल परिणीति चोपड़ा के लिए आत्मावलोकन का है। इस वक्त उनके पास कोई फिल्म नहीं है और चोपड़ा-जौहर कैंप के बाहर का उन्हें खास अनुभव नहीं है। वह फिल्म लेडीज वर्सेज रिक्की बहल में हवा के ताजा झोंके की तरह आई थीं, मगर उसके बाद ऐक्टिंग के नाम पर एक ही जैसे हाव-भाव हर फिल्म में दिखाती रहीं। परिणीति आज अपने बबली और बिंदास लटकों-झटकों में अटक गईं हैं।
परिणीति की पिछली दो फिल्मों किल दिल और दावत-ए-इश्क ने उनकी उम्मीदों को जबर्दस्त धोखा दिया। दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर हलचल नहीं मचा सकीं और परिणीति तक इनके नतीजों से हिल गईं। ये फिल्में उत्तर भारत के दर्शकों को केंद्रित करके बनी थीं और वही लोग इन्हें देखने नहीं गए।
फिल्में तो कमजोर थी हीं, लेकिन इनके बुरे नतीजों के पीछे फिल्मों की मार्टेकिंग और परिणीति के पीआर का बड़ा हाथ है। ये लोग यह नहीं समझ सके कि उत्तर भारत में इन फिल्मों और परिणीति को कैसे प्रमोट किया जाना चाहिए। खुद परिणीति भी नाकामियों के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं।