साल 1942 मेंए तहजीब, इतिहास और कलाकारों के लिए मशहूर शहर भोपाल ने इस देश को ऐसी विरासत दी, जिसने ना सिर्फ कला के क्षेत्र में अपने नाम का बुलंदी से झंडा गाड़ा, बल्कि कला के क्षेत्र में महिलाओं को एक ऊंचा दर्जा दिलवाया, इज्जत दिलवाई, हौसलाअफजाई करवाई। हम बात कर रहे हैं, भारत की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली की।
शकीला ने उस दौर में मर्दों के हाथों से कव्वाली छीनकर उसे महिला की आवाज दी, उसे एक नया क्लेवर दिया, जिसके बारे में देश के कव्वालों ने भी ना कभी सोचा था, ना कभी उम्मीद की थी। ये आजाद भारत के उस दौर की बात है, जब महिलाओं को घर की चौखट के बाहर कदम तक नहीं रखने दिया जाता था। शकीला के वालिद, उनके चच्चा शायर थे, छोटी सी शकीला दिनभर घर में शेरों-शायरी सुना करती थीं। घर में रोज जुटने वाली इस महफिल ने शकीला के अंदर शायरी और कव्वाली के प्रति कभी ऐसा प्रेम जगा दिया था जिसके दम पर वो देश की पहली महिला शायर और कव्वाल बनीं। हालांकि शकीला के लिए इस मुकाम को पाना बेहद मुश्किल था।
शकीला ने मशहूर शायर निदा फाजली को दिए एक इंटरव्यू में कहा था की जब उन्होंने कव्वाल बनने की इच्छा घर वालों को बताई तो उनके घरवालों ने ही इसका पुरजोर विरोध किया। किसी ने उन्हें जान से मारने की धमकी दे डाली तो किसी ने उन्हें हाथ पैर तोड़ डालने की धमकी दी। मगर शकीला रुकने वाली कहां थी। उनकी गाई कव्वाली की आवाज, उनके घरों की दीवारों को चीरते हुए भोपाल की हर गली, हर घर में जा घुसी। और लंबे संघर्ष के बाद उन्हें स्टेज पर गाने के मौका भी मिला।