-निर्माता-निर्देशकः आदित्य चोपड़ा
-सितारेः रणवीर सिंह, वानी कपूर
रेटिंग *1/2
-आप आदित्य चोपड़ा के प्रशंसक हैं तो जरूर फिक्र करेंगे कि फिल्म-दर-फिल्म उनकी रचनात्मकता का कद घटता गया है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से उन्होंने जिन करोड़ों दिलों को छुआ था वह संवेदनशील स्पर्श मोहब्बतें और रब ने बना दी जोड़ी से रिसता हुआ एक बनावटी और बासी लगती फिल्म पर आ टिका है। पैसे की पॉलिश जरूर थोड़ी देर को इसके चमकदार होने का भ्रम पैदा करती है। आश्चर्य कि बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित कहलाने वाले प्रोडक्शन हाउस के शीर्ष रचनात्मक अधिकारी के पास कहने को ढंग की कहानी तक नहीं है। यह फिल्म गवाह है कि आदित्य चोपड़ा अपने स्टूडियो से बाहर संभवतः देख नहीं पा रहे हैं कि दुनिया ‘फ्रेंच किस क्रांति’ से कहीं आगे निकल चुकी है।
मॉडर्न जमाने की लव स्टोरी है 'बेफिक्रे'
दर्जनों बॉलीवुड फिल्मों में आजमाए फार्मूले को लेखक-निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने यहां फ्रेंच तड़का मारा है। उन्हीं के बैनर से तीन साल पहले आई ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में ऋषि कपूर हीरो-हीरोइन के प्यार पर कहते हैं, ‘तुम लोग भगते बोहोत हो। पहले एक-दूसरे के पीछे भगते हो, फिर एक-दूसरे से दूर भगते हो।’ बेफिक्रे का दायरा यही है। बस, मामला देसी से फ्रेंच हो गया है। दिल्ली का लड़का पेरिस में पंजाबी मां-बाप की ऐसी लड़की से मिलता है, जो पैदाइशी फ्रेंच है। पहले दोनों साथ आते हैं। फिर लिव-इन में रहते-रहते उनकी राहें जुदा होती हैं। अंततः लड़की को सूटबूट वाला सूटेबल बैंकर मिलता है, जो उससे शादी करना चाहता है। वह हां कह देती है तो दिल्लीवाले को एहसास होता है कि लड़की के बिना नहीं रह सकता। अब इससे ज्यादा अनुमानित द एंड क्या होगा कि लड़की दिल्लीवाले की हो जाएगी! बैंड बाजा बाराती, सारे खुश!!
फिल्म का स्क्रीन प्ले चालू किस्म का है। जिसमें कल्पनाशीलता का इस्तेमाल नहीं है। रणवीर सिंह हीरो से ज्यादा हंसोड़ बनते और कुछ चंचल डायलॉग मारते पंचर टायर में हवा भरने की बेकार कोशिश करते हैं। प्लेबॉय छाप अंडरवीयर पहन कर चौंकाते इस ‘बाजीराव’ की तलवार यहां धार खो देती है। वानी कपूर की स्थिति और दुखद है। उनके होंठ ठंड में पपड़ाए हैं और वह लुक में मर्दाना-सी हैं। रणवीर-वानी की जोड़ी देखने में नहीं जमती। उनके एक-दूसरे को ‘किस’ करने पर भी चिंगारियां पैदा नहीं होतीं।
यंगस्टर्स को पसंद आएगा 'बेफिक्रे' का ये अंदाज
यहां वाकई कुछ देखने लायक है तो, पेरिस! वास्तव में वही फिल्म को ‘अनदेखेबल’ होने से बचाता है। लगता है कि जब यह पर्दे पर इतना सुंदर है तो सचमुच कितना सुंदर होगा। इसके लिए आप आदित्य चोपड़ा को धन्यवाद दे सकते हैं। वैसे यह समय पेरिस की फ्लाइट पकड़ने का कम और एटीएम/बैंकों की लाइन में लगने का ज्यादा है। जिन्हें जेब की फिक्र नहीं है वे बेफिक्रे देख सकते हैं।