क्यों लिखी गई ‘मधुशाला’
हिंदी साहित्य या फिर कविताओं को पसंद करने वाले लोगों ने ‘मधुशाला’ जरूर पढ़ी या सुनी होगी। हरिवंश राय बच्चन ने अपने इस काव्य को साल 1933 में लिखा था, जो आज तक पसंद की जाती है। साल 2011 में भोपाल में अमिताभ फिल्म ‘आरक्षण’ की शूटिंग कर रहे थे। तब वहां पर उन्होंने एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यहां अमिताभ बच्चन ने पिता को याद करते हुए उनकी 'मधुशाला' गई। साथ ही उन्होंने बताया कि बाबूजी शराब नहीं पीते थे, बहुत से लोगों को आश्चर्य होता था पीते नहीं हैं तो शराब पर लिखते कैसे हैं? लोगों को लगता था यह लेखक दिन-रात शराब के नशे में चूर रहता है।
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लोगों के सवाल पर अमिताभ का जवाब
इसके आगे अभिनेता ने कहा था कि एक बार बाबूजी ने कहा था कि नशे से इंकार नहीं करूंगा। जिंदगी ही एक नशा है। कविता भी एक नशा है और भी बहुत से नशे हैं। अपने प्रेमियों का भ्रम दूर करने के लिए मैंने एक समय एक रुबाई लिखी। हालांकि, पिता के इस जवाब के बाद भी लोग उनसे पूछ ही लेते थे कि जब पीते नहीं हैं तो प्रेरणा कैसे मिलती है? तब उनका कहना था कि एक बार मेरे मन में ख्याल आया कि मेरा जन्म कायस्थों कुल में हुआ है, जो प्रसिद्ध ही पीने के लिए है, तो यह सब मेरे अंदर तो जन्म से होगा।
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मधुशाला की कुछ पंक्तियां
अमिताभ बच्चन समय-समय पर भी ट्विटर पर ‘धमुशाला’ की पंक्तियां लिख पिता को याद करते हैं। दीवाली के मौके पर उन्होंने अपनी तस्वीर शेयर की थी और इस कविता की चंद लाइनों को लिखा था। वह इस प्रकार थी....
अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला
फिर भी वृद्धों से जब पूछों, एक यही उत्तर पाया
अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला