थलापति विजय की फिल्म 'जन नायकन'
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सिनेमा का काम मनोरंजन करना है
आगे उन्होंने कहा, ‘सेंसर बोर्ड वास्तव में अब जो करता है वह सुरक्षा नहीं, बल्कि केवल दिखावा है। सिनेमा का उद्देश्य जनता को शिक्षित करना नहीं बल्कि एक आईने के रूप में काम करना और मनोरंजन करना है। अधिकारियों का काम उन्हें एडिट करना या काटना नहीं है, बल्कि नागरिकों पर इतना भरोसा करना है कि वे खुद फैसला कर सकें। सेंसरशिप के दौरान फिल्म उन लोगों के व्यक्तिगत विचारों, पूर्वाग्रहों और उद्देश्यों से प्रभावित होती है, जो इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं। अलग-अलग उम्रों का वर्गीकरण समझ में आता है। कंटेंट से जुड़ी चेतावनी देना समझ में आता है। लेकिन सेंसरशिप समझ में नहीं आती।’
सेंसर बोर्ड की मानसिकता पर उठाया सवाल
राम गोपाल वर्मा ने अपने निष्कर्ष में कहा, ‘दुनिया पहले ही कई ऐसे प्लेटफार्मों की ओर बढ़ चुकी है जो अनियंत्रित और बिना निगरानी वाले हैं। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारियों में यह स्वीकार करने का साहस है कि वे अब आउटडेटेड हो चुके हैं। उससे भी बढ़कर ये कि क्या हम फिल्म इंडस्ट्री के रूप में सामूहिक रूप से इस पर सवाल उठाने की इच्छाशक्ति रखते हैं। इसलिए किसी विशेष फिल्म को लेकर कभी-कभार इस मुद्दे को उठाने के बजाय, लड़ाई उस विशेष मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जिसने सेंसर बोर्ड को जन्म दिया।’
अब 21 जनवरी को होगी 'जन नायकन' पर सुनवाई
हालांकि, एच. विनोद द्वारा निर्देशित थलपति विजय की ‘जन नायकन’ को शुक्रवार 9 जनवरी को मद्रास उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने हरी झंडी दे दी। साथ ही सीबीएफसी को फिल्म को तुरंत यूए सर्टिफिकेट देने का निर्देश दे दिया था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बाद में इस पर अस्थायी रोक लगा दी। अदालत ने अब मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को तय की है।