'लंच बॉक्स' पर तारीफों के अंबार लग रहे हैं। लेकिन हम आपको इस फिल्म की पांच वे कमियां बता रहे हैं जो आपको भी खटकी होगी।
किसी भी मुख्यधारा की फिल्म में हम आमतौर पर तर्क-वितर्क नहीं करते। हीरो तीन मंजिल से क्यो कूद रहा है। एक गाने में दस कपड़े कैसे बदल सकते हैं या कुछ और भी। लेकिन जब हम एक यथार्थ का सिनेमा रचने का प्रयास करते हैं तो थोड़ी सी चूक भी दर्शकों को खटकती है।
'लंच बॉक्स' भी कई जगह ऐसी ही गलतियां करती हुई चलती है। अब यह दर्शकों पर निर्भर करता है कि वह इसे यथार्थ परक सिनेमा को भी फिल्म मानकर ऐसी भूलों की चर्चा करते हैं या उन्हें छोड़ते हैं।
1- फिल्म ऐसे दौर में है जब दूरदर्शन का युग खत्म हो चुका होता है। फिल्म यह भी बताती है कि यह एमपी 3 का युग है। बावजूद इसके फिल्म के दोनों पात्रों के पास मोबाइल फोन नहीं है। मोबाइल तो छोड़िए फिल्म के दोनों पात्र कभी भी लैंडलाइन फोन का नंबर भी अदला-बदली करने की बात नहीं करते।
2- 21वीं शताब्दी का कोई भी दफ्तर बिना कंप्यूटर का नहीं है। भले ही कई सरकारी संस्थानों में काम फाइलों से होता हो लेकिन कम से कम बॉस के केबिन में कंप्यूटरनुमा चीज होती ही है। इस फिल्म का ज्यादातर हिस्सा ऑफिस में ही गुजरता है। बावजूद इसके एक भी कंप्यूटर तो छोड़िए टाइपराइटर भी दफ्तर में नहीं होता।
3- मुंबई के डब्बा वालों पर उसकी सही और सटीक डिलेवरी के लिए पहचाना जाता है। मुंबई आने वाले कुछ दूसरे देशों के भी राष्ट्र प्रमुख मुंबई के डब्बावालों की सटीकता की प्रशंसा कर चुके हैं। बावजूद यह फिल्म यह दिखाती है कि एक डिब्बा लगातार एक ही जगह पर गलत पहुंच रहा है। जबकि उसे डिब्बे के कवर पर एक नंबर लिखा है जो कि उस डिब्बा कंपनी को चिहिन्त करता है।
4- फिल्म की नायिका इरा के हसबैंड को जो डिब्बा पिछले एक महीने से मिल रहा है वह एक डब्बा कंपनी का है। डब्बा कंपनी का खाना और घर के खाने में जमीन आसमान का फर्क होता है। मानाकि नायिका के पति का फोकस अपनी पत्नी पर नहीं है लेकिन क्या वह एक ही तरह का खाना खाकर रोज इस बात को नोटिस नहीं करता कि उसे खाने में क्या मिल रहा है। फिल्म में इसका जिक्र होता है मगर सिर्फ एक बार।
5- ये थोड़ी ज्यातीय हो सकती है लेकिन प्रश्न वाजिब है कि क्या कि उस समय सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उस समय कोई प्रचलन नहीं था। इस फिल्म में मुंबई लोकल के रंगे हुए डिब्बे दिखाए जाते हैं ये डिब्बे 2007 के बाद लॉच हुए। उस समय तक फेसबुक भारत के कम से कम बड़ शहरों में तो पहुंच ही चुका था।