गोवा में 48वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया समारोह संपन्न हो चुका है। पहले यह समारोह एक साल दिल्ली और एक साल देश के किसी अन्य राज्य में हुआ करता था। देश के अनेक राज्यों को इस समारोह का आतिथेय होने का अवसर मिला। यह देश का अकेला ऐसा समारोह रहा है, जिसने दुनिया के उत्कृष्ट सिनेमा को एक प्लेटफॉर्म पर लाने का प्रयास किया। उन फिल्मकारों को हिंदुस्तान में इस समारोह का हिस्सा बनने के लिए निमंत्रित किया, जिनके नाम और व्यक्तित्व का अर्थ ही समृद्ध सिनेमा हुआ करता था।
आरंभ के कुछ वर्षों तक यह समारोह बॉलीवुड के फिल्मकारों और सितारों की बड़ी आमद का केंद्र बना रहा, लेकिन बाद में धीरे-धीरे देश के दूसरे राज्यों के फिल्मकार, कलाकार, दुनिया के अनेक देशों के फिल्मकार और कलाकार आकृष्ट होना शुरू हुए। पिछले एक दशक में इस समारोह के एक ही राज्य में सिमटकर रह जाने, शेष देश और उसके राज्यों से बड़ी दूर हो जाने और देखने वालों के लिए अपेक्षाकृत व्यय साध्य होने के बाद भी स्थापित हुआ कहा जा सकता है।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर 195 फिल्मों के साथ इस समारोह की शुरुआत एक अच्छा संकेत था। इस बार के समारोह में 82 देशों के सिनेमा की भागीदारी हुई। इनमें दस वर्ल्ड प्रीमियर्स, दस एशियन एवं इंटरनेशनल प्रीमियर्स एवं 65 भारतीय प्रीमियर्स शामिल थे। ईरान के शीर्षस्थ फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म 'बियोंड द क्लाउड्स' से समारोह की शुरुआत तथा समापन अवसर पर पाब्लो सीजर की इंडो-अर्जेंटीनियन फिल्म 'थिंकिंग आॅफ हिम' का प्रदर्शन प्रीमियर देखने वालों के लिए रोचक अनुभव रहा। इस बार कनाडा को विशेष रूप से सिनेमा-केंदि्रत किया गया, जिसमें श्रेष्ठ फिल्मों के साथ प्रतिष्ठित कलाकारों और फिल्मकारों का भी आना-जाना लगा रहा।
48वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में देश-दुनिया की तकरीबन 30 महिला फिल्मकारों का सिनेमा देखने का अवसर फिल्म समारोह में शामिल होने वाले सिनेप्रेमियों को मिला, जो सुखद संकेत है। विदेशी सिनेमा में जेम्स बॉण्ड की फिल्मों की समानांतर सफलता एवं लोकप्रियता का आकर्षण इस बार इस समारोह को भी बचा नहीं पाया है। यही कारण है कि बॉण्ड की 9 फिल्में इस समारोह का हिस्सा बनी। लगभग नौ दिनों के इस समारोह में इतनी सारी फिल्मों का शामिल होना दिलचस्प था, उसकी विविधता उतनी ही आकृष्ट करने वाली भी थी।
ऑफ एन ओल्ड मैन', रीमा लागू की मराठी फिल्म 'सवाली', जयललिता की तमिल फिल्म 'अइयारथिल ओरुवन', कुंदन शाह की 'जाने भी दो यारों' प्रमुख रहीं। गोवा की अनुपम प्रकृति और छटाओं के बीच आयनॉक्स, कला अकादमी भवन, मेक्विनेज भवनों में फिल्मों के प्रदर्शनों ने प्रतिदिन सुबह लगभग नौ बजे से देर रात बारह बजे के बाद तक सिनेमा का ऐसा माहौल बनाया, जिसको देखकर लगता था कि दुनिया के सिनेमा को एक जगह पर देख पाने का इससे बेहतर सुअवसर और नहीं है।