टी पी अग्रवाल ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने पिछले तीन साल से मराठी फिल्मों को आर्थिक सहायता देनी बंद कर रखी है। इस अवधि में किसी भी निर्माता को महाराष्ट्र में सब्सिडी नहीं मिली है। और, मौजूदा समय में तीन सौ से ज्यादा फिल्मों के आवेदन महाराष्ट्र सरकार के पास सब्सिडी के लिए लंबित है। न तो इन फिल्मों के आवेदन पर विचार हो रहा है और न ही कोई अधिकारी इस बारे में फिल्म निर्माताओं से बात ही कर रहा है। इसकी बड़ी वजह ये बताई जा रही है कि सब्सिडी के लिए आवेदन करने वाली फिल्मों को देखने, उन्हें मूल्यांकित करने और सब्सिडी का भुगतान तय करने वाली समिति ही महाराष्ट्र में काम नहीं कर रही है।
इम्पा ने महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मंत्री अमित देशमुख को लिखे पत्र में मांग की है इस बारे में तुरंत कदम उठाए जाएं और मराठी फिल्मों को राज्य सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता तय करने वाली समिति का तुरंत गठन किया जाए। निर्माताओं की संस्था ने इस बात की तरफ भी राज्य सरकार का ध्यान दिलाया है कि पूरे देश के तमाम राज्य फिल्मों के लिए मुक्त हस्त से आर्थिक सहायता दे रहे हैं। क्षेत्रीय फिल्मों को विदेश में भी आर्थिक सहायता मिलने लगी है। ऐसे में मराठी फिल्म उद्योग को मुंबई में जीवित रखने के लिए इस समिति का बनाया जाना और लंबित मामलों को निपटाया जाना तुरंत जरूरी है।
महाराष्ट्र सरकार को लिखे इस पत्र में एक अहम मुद्दा और उठाया गया है और वह ये कि महाराष्ट्र सरकार के कुछ अधिकारियों ने ऐसी नीति बना ली है जिसके चलते महाराष्ट्र में बनने वाली सिर्फ उन्हीं फिल्मों को सब्सिडी देने की बात कही जाती हैं जिनके निर्माता मराठी चित्रपट महामंडल नामक संस्था के सदस्य हैं। इम्पा ने इस तरफ राज्य सरकार का ध्यान दिलाया है कि उनकी संस्था न सिर्फ देश में 1937 से फिल्म निर्माताओं की नुमाइंदगी कर रही है बल्कि ये देश की सबसे बड़ी फिल्म संस्था भी है। इम्पा ने महाराष्ट्र सरकार से अनुरोध किया है कि मराठी फिल्मों को आर्थिक सहायता देते समय निर्माता के किसी खास संस्था का सदस्य होने की अनिवार्यता समाप्त करनी चाहिए और मुंबई व महाराष्ट्र में सक्रिय सभी निर्माताओं को मराठी फिल्म बनाने पर आर्थिक सहायता मिलनी ही चाहिए।