हर वर्ष पुण्यतिथि पर जब मैं उसकी कब्र पर जाता हूं, मेरी मां की कब्र पर, मेरा दिल हमेशा उसकी याद में या नींद में डूबने लगता है। मुझे लगता कि मैं तुमको देखता हूं मां।
तुम बहुत धीमे मेरी तरफ आ रही हो। इतने धीमे कि मैं तुम्हारी सहायता करना चाहता हूं। तुम्हारे चेहरे पर मेरी मुस्कान है।
इस वक्त में बिना बोले रोना चाहता हूं।
कब्रिस्तान के प्रवेश द्वार से मैं भागता हूं, मां की कब्र की तरफ। आग की लपट से भी तेज, हवा की छाया से भी हल्का। मैं रोकर हल्का होना चाहता हूं। मैं देखता हूं दूर एक नदी का बहना। कुछ और दूर एक पुल। सामने शाश्वत अवरोध, पृथ्वी, मजार। यहां मेरी आत्मा है। मेरी तरफ देखो। मेरी तरफ, यहां मैं हूं। यहां मेरे चित्र हैं। मेरी शुरुआत। दुख और सिर्फ दुख। यह उसका व्यक्ति चित्र है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्या मैं यहां हूं? मैं कौन हूं? पास से गुजरते वक्त तुम मुस्कुराओगे। तुम्हें आश्चर्य होगा, तुम हंसोगे! दुख का सरोवर, कम उम्र में पके बाल, आंखे-आंसुओं का शहर, खुद लगभग नहीं, दिमाग जो अब नहीं है। फिर वहां क्या है? मैं देखता हूं उसे घर के कामों में व्यस्त, मेरे पिता के आदेशों को मानते हुए, हमेशा एक घर का सपना देखते। एक परचून की दुकान जमाते, उसमें तरह-तरह का सामान भरते हुए, बिना पैसे के, हमेशा उधार। किन शब्दों से, किन अर्थों में उसे मैं मुस्कुराता हुआ बता सकता हूं। घंटों दरवाजे के सामने या मेज पर बैठे इन्तजार करती, किसी पड़ोसी के आने का, जिसके साथ वह अपनी व्यथा बांट सकें। रात को दुकान बंद हो चुकी है, सारे बच्चे घर में हैं, पिता मेज पर ही सो चुके हैं, लैम्प जल रहा है, कुर्सियां ऊब चुकी हैं- दरवाजे के बाहर आसमान कहां है? यह कोई नहीं बता सकता, जहां प्रकृति मौन हो चुकी है। ऐसा नहीं कि हम लोग चुपचाप हो गए, मगर चारों ओर निस्तब्धता है। मां अलाव के सामने बैठी है। एक हाथ मेज पर रखा है और दूसरा अपने पेट पर। उसका चेहरा उस बिंदू तक उठा हुआ है जहां उसका हरेक बाल करीने से पिन से बंधा हुआ है। वह अपनी उंगलियों से धीमे-धीमे बजा रही है। मेज पर मोमजामा बिछा है। वह धीमे-धीमे कई बार मेज बजाती है। जिसका यह अर्थ हैः
'हर कोई सो चुका है। कैसे बच्चे हैं मेरे। मेरे साथ बात करने वाला कोई नहीं है।' वह बहुत बातूनी थी। उसे बात करने मे मजा आता था। बातचीत में वह नये-नये शब्द गढ़ा करती और उन्हें इस तरह प्रस्तुत करती कि सुनने वाला संकोच से भर जाता। रानी की तरह, तनी हुई, निश्छल, बाल अपनी जगह पर जमे हुए, वह अपने बंद होंठों से प्रश्न पूछती है, वे होंठ मुश्किल से हिलते दिखाई देते हैं। मगर वहां कोई नहीं है, जो उसे उत्तर दे। मैं अकेला था जो यह समझ रहा था। किंतु बहुत दूर से। 'मेरे बेटे!' वह कहती है, 'मुझसे बात करो।'
मैं एक छोटा सा लड़का। मां एक रानी की तरह। मैं क्या कह सकता था! वह नाराज है। उसकी उंगलियां मेज पर तेजी से चल रही हैं। और घर शांत दुख के लिफाफे में बंद है। शुक्रवार रात के खाने के बाद जब पिता हमेशा की तरह प्रार्थना के दौरान सो चुके हैं (मेरे पिता मुझे माफ करना) उसकी आंखें दुख से भर गईं हैं और वह अपने आठों बच्चों से कहती है-'बच्चों, चलो हम सब मिलकर राब्बी गीत गाएं, मेरे साथ गाओ।' बच्चे गाते हैं। बच्चे सो जाते हैं। वह रोने लगती है और मैं कहता हूं-'तुम फिर शुरू कर रही हो, मैं अब नहीं गा सकता।' मैं उससे कहना चाहता था कि मेरी प्रतिभा उसके अंदर छिपी है। उससे ही मुझे सब प्राप्त है अलावा उसकी मनीषा के। वह मेरे कमरे की तरफ आ रही है (आंगन में ज्याविच का कमरा है) वह दरवाजा खटखटाती है और पूछती है-'मेरे बेटे क्या तुम वहां हो? तुम क्या कर रहे हो? क्या बेला तुम्हारे साथ है? क्या तुमने खाना खा लिया?' 'मां देखो! क्या तुम्हें पसंद है?' वह मेरे चित्रों को देखती है। भगवान जाने िकस आंखों से! मैं उसके फैसले का इंतजार करता हूं! अंत में वह बहुत धीमे से कहती है-'बेटे मुझे लगता है कि तुममे प्रतिभा है, मगर तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि तुम क्लर्क बनो। मैं तुमसे माफी मांगना चाहती हूं किंतु तुमने यह सीखा कहां से?' वह सिर्फ हम बच्चों की ही नहीं, अपनी बहनों की भी मां थी। यदि उनमें से किसी की शादी होने वाली हो, तो लड़का देखना उसी का काम था। वह ढूंढती थी, उसके बारे में पता करती थी और यदि वह लड़का दूसरे शहर में रहता हो, तो वहीं जाकर पता करना, उसके बारे में बात करना, यह सब काम किया करती थी और शाम को खिड़की से भीतर झांककर उसके बारे में पता लगाने का काम भी उसी का था। कई साल हो गए उसकी मृत्यु हुए। कहां हो तुम मेरी छोटी प्यारी मां? स्वर्ग में या पृथ्वी पर? मैं यहां तुम्हारे लिए।
यदि मंै तुम्हारे नजदीक हूं, तो अपने आपको खुश पाता हूं। कम से कम मैंने तुम्हारी मजार को देखा है, उसे छुआ है। उफ! मां! और ज्यादा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। मैं रोता हूं कभी-कभी। किंतु मेरी आत्मा हमेशा तुम्हारे बारे में सोचती है और अपने बारे में और मेरे विचार दुख से भर जाते हैं। मैं तुमसे नहीं कहता कि तुम मेरे लिए प्रार्थना करो। तुम खुद जानती हो कि मैं कितना दुखी हूं। मुझे बताओ मेरी प्यारी मां। दूसरी दुनिया से, स्वर्ग से, बादलों से, जहां भी तुम हो वहां से बताओ, क्या तुम्हें मेरा प्यार सांत्वना देता है? क्या मेरे प्यार-भरे शब्द थोड़ी मिठास घोल पाते हैं, हल्का-सा प्रेम स्पर्श कर पाते हैं?
-यह अंश राजकमल प्रकाशन से आई किताब 'आप-बीती' से। मार्क शागाल की इस किताब का हिंदी अनुवाद चित्रकार और लेखक अखिलेश ने किया है।