शाम के उदास सन्नाटे में रोशनी जलती है और एक घर हंस पड़ता है। घर कश्मीर के इलाके का है। बाहर बर्फ पड़ रही है। अंदर एक मां है। नाम है नफीसा। नफीसा मौन है। लेकिन मां के चेहरे को जानने के लिए भाषा या संवाद की जरूरत कब पड़ती है...घर हंस रहा है। हंसता हुआ यह अकेला घर है इस बस्ती में। घर तो बस्ती में और भी हैं, लेकिन बेरौनक-सा। अपनी नि:संतान पत्नी को बेहिसाब चाहने वाला, उसे बच्चे के रूप में चाइनीज गुड्डा देकर संतान के भ्रम को यकीन में बदल कर, सच को जिंदगी में उतार लाने वाला टैक्सी ड्राइवर गुलाम रसूल कहता है, "घर की साफ-सफाई न हो, तो घर मर जाता है। शाम के समय बत्ती न जले, तो घर मर जाता है।" बस्ती के दूसरे घर मर गए थे। सब लोग बस्ती छोड़कर नीचे घाटी में चले गए। रोज-रोज की गोलाबारी... कौन सहे? लेकिन रह गए गुलाम रसूल। रह गई उसकी पत्नी नफीसा।
नफीसा ने कहा- "मरेंगे तो अपने घर में। जिएंगे तो अपने घर में।" गुलाम रसूल ने खाली पड़े घरों की साफ-सफाई की। रोशनी जलाई। रोशनी जलती है और पूरी बस्ती हंसती है। गुलाम रसूल हंसता है। नफीसा हंसती है। उनके पास अब उनका एक बेटा है। नाम है जिगरा, एक चाइनीज गुड्डा। जिगरा बोलता भी है। हर साल गुलाम बड़े साइज का एक गुड्डा लाकर उससे चुपके से बदल देता है। हर साल अपने जन्मदिन के बाद जिगरा बढ़ रहा है। मां की ममता बढ़ रही है। गुलाम के चेहरे का संतोष बढ़ रहा है। डॉक्टरों के एक सेमिनार में भाग लेने डॉक्टर सिद्धांत कौल कश्मीर पहुंचते हैं। डॉक्टर कौल की मुलाकात गुलाम से होती है। तभी फोन पर जिगरे के बीमार होने की खबर गुलाम को मिलती है। गुलाम, डॉक्टर कौल को लेकर रात के अंधेरे में अपने गांव...अपने घर पहुंचता है। डॉक्टर कौल अपने विज्ञान मन से जिगरे को देखता है। नफीसा ममता के मन से। गुलाम का मन, अपनी बीवी के मन के साथ है। आखिर डॉक्टर का मन बदलता है। उसे भी कबूल करना पड़ता है कि दर्द के अथाह समंदर में डुबे हुए लोगों के घरों को भी मोहब्बत का एक धागा बचाए रख सकता है और संसार का हर सच यकीन पर खड़ा होता है।
तो क्या जिगरा एक सच है? किसका सच है- डॉक्टर कौल का, गुलाम का, नफीसा का या फिर तीनों का? या फिर जिगरा एक सवाल है कश्मीर में रहने वाले उन हजारों-लाखों लोगों के लिए जो कहीं भी रहें, अपने सपने में अपने बिछड़े घर को ही देखते हैं। क्या जिगरा सिर्फ कश्मीर में रहता है? नाटककार और वरिष्ठ अभिनेता सौरभ शुक्ला का नया नाटक 'बर्फ' ऐसे सच और ऐसे कई सवाल दर्शकों के सामने रखता है। सवालों और सच के साथ ही कश्मीर अपने आतंकवाद की समस्या और राजनीति के साथ आ खड़ा होता है।
पोलिश नाटककार और कवि ज्बेग्नयू हर्बर्ट जैसा कि कहते हैं कि हर अच्छी रचना दृश्य जगत के साथ न्याय करने की कोशिश है, तो सौरभ शुक्ला के इस नाटक में यह कोशिश शुरू से अंत तक बनी दिखाई दी। सौरभ शुक्ला का यह नाटक किसी भी तरह की चालू मुहावरे की अलंकारिता, सबको तुच्छ समझने का बड़बोलापन और मध्यमवर्गीय दया, सबसे मुक्त है। बड़ी बात यह भी है कि सौरभ न तो लेखन में और न ही निर्देशन में, किसी 'शहादत या वीरता भाव' से ग्रस्त नहीं दिखते, लेकिन नाटक के प्रति यह किसी भी तरह का उनका अविश्वास नहीं है। सौरभ कहते हैं, “इस नाटक को जिंदगी के बीच रास्ता देने की कोशिश जरूर कह सकते हैं।” कुछ ही दिन पहले सौरभ अपने नाटक '2 टू टैंगो थ्री टू जाइव' को लेकर दिल्ली आए थे। इस बार वे नई दिल्ली के कमानी सभागार में 11 से 13 मार्च तक 'बर्फ' के साथ थे। तो सौरभ के इस नाटक में बर्फ एक जिंदगी भी है। बेशक मंच पर नाटक एक बिंदु से शुरू होता है और दूसरे बिंदु पर समाप्त हो जाता है, किंतु मन की सतह पर नाटक की जिंदगी चलती रहती है। अपनी रोशनी में चमकती हुई। वह बहती नहीं, कभी-कभी ठहर जाती है। कभी बर्फ बन जाती है। कहानी या उपन्यास से अलग, क्योंकि नाटक शब्दों से ज्यादा दृश्यों पर निर्भर रहता है। यहां शब्द उन घटनाओं के समानांतर चलते हैं, जो हम देख रहे होते हैं। और जब नहीं भी देख रहे होते हैं, तो दृश्य बर्फ की तरह स्मृति के कोने में पड़ा रहता है। थोड़ी-सी हलचल हुई नहीं कि बर्फ पिघलने लगती है। सौरभ इस नाटक में हमें कोई फैसला तो नहीं सुनाते, लेकिन हम खुद फैसला कर सकने की मनोदशा में जरूर पहुंच जाते हैं। हां, कई बार कहानी में कुछ चीजें अटपटी भी लगती है। खासकर तब जब जिगरा बीमार है या नहीं, इसका फैसला करने के लिए नफीसा भटकती रूहों से पूछती है। हालांकि इससे कहानी भटकती नहीं, गुलाम के दिल में घर को बसाने की जिद जरूर दिखाई देती है, करीब-करीब कवि श्याम दिवाकर की इन पंक्तियों की तरह-
“घर का बनना /कठिन है/ पर घर का बसना / बहुत ही कठिन/ अपनों के लिए/ अपनों को मिटा देने वाला/ बसा पाता है घर। ”
गुलाम को पता है कि जिगरा बीमार हो ही नहीं सकता। गुलाम को पता है कि रूह से पूछने की बात सरासर बकवास है, फिर भी वह नफीसा की हर बात मानता है, क्योंकि उसे अपने घर को बसाना है, बचाना है। अश्विन गिडवानी प्रोडक्शन के इस नाटक में नफीसा की भूमिका में सादिया सिद्दकी, गुलाम की भूमिका में सुनील पालवाल और डॉक्टर सिद्धांत कौल की भूमिका में विनय पाठक खूब जमे। तभी तो नाटक खत्म होने के बाद लगा मानो खुद को जानने की एक नई शुरुआत हो