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सीट का समीकरण: पिछले छह में चार चुनाव सपा, तो एक-एक रहा भाजपा-कांग्रेस के नाम; ऐसा है सेरनी का सियासी इतिहास

Mon, 26 Oct 2026 08:32 PM IST
अमन तिवारी इलेक्शन डेस्क, नोएडा

सार

रायबरेली जिले की सरेनी विधानसभा सीट साल 1957 में अस्तित्व में आई थी। शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का दबदबा रहा। पिछले छह में चार चुनाव सपा के नाम रहे। वहीं, एक-एक चुनाव भाजपा और कांग्रेस के नाम रहे। आइए इस विधानसभा सीट के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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सरेनी सीट का समीकरण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। हर सीट का अपना अलग राजनीतिक इतिहास, सामाजिक समीकरण और चुनावी महत्व है। यूपी की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात रायबरेली जिले की सरेनी विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
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पहले जानते हैं सरेनी विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन्हीं में से एक जिला रायबरेली है। जिले के अंतर्गत कुल 6 विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें- बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली, सलोन, सरेनी और ऊंचाहार शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम सरेनी विधानसभा सीट की बात करेंगे। रायबरेली जिले की सरेनी विधानसभा सीट साल 1957 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह विधानसभा क्षेत्र अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ था। यहां से पहले विधायक गुप्तार सिंह बने थे। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की थी।
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सरेनी विधानसभा सीट का जातिगत समीकरण
सरेनी विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय (ठाकुर), पासी, यादव और मुस्लिम समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी ब्राह्मण मतदाताओं की है, जो लगभग 20% हैं। इसके बाद क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 19% और पासी मतदाताओं की आबादी लगभग 14% है, जबकि यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 13% और मुस्लिम मतदाताओं की आबादी भी लगभग 13% है। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं। 

सरेनी विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे से शुरुआत

सरेनी विधानसभा सीट पर यहां के पहले यानी कि 1957 के चुनाव से लेकर 1980 के चुनाव तक लगातार कांग्रेस का दबदबा रहा। इन चुनावों में सरेनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने लगातार जीत दर्ज की।

इस चुनावी सफर की शुरुआत में कांग्रेस के गुप्तार सिंह 1957 से लेकर 1969 तक लगातार चार बार विधायक बने। 1957 में उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के नरेंद्र बहादुर सिंह को 7,969 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 1962 के चुनाव में उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के जय करण सिंह को 7,466 वोटों के अंतर से हराया। वहीं 1967 के चुनाव में कांग्रेस के गुप्तार सिंह ने भारतीय जनसंघ (BJS) के जय करण सिंह को 2,037 वोटों के अंतर से मात दी, जबकि 1969 के चुनाव में भी उन्होंने जय करण सिंह को ही 6,579 वोटों के अंतर से हराया।

इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। 

सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।

1974: बदला प्रत्याशी का चेहरा, फिर भी फिर भी जीती कांग्रेस
इन चुनावों के बाद रायबरेली की सरेनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी का चेहरा तो बदला, लेकिन नतीजों में कोई बदलाव नहीं हुआ। प्रत्याशी बदलने के बावजूद कांग्रेस यहां लगातार चुनाव जीतती रही। जीत की इस कड़ी में 1974 में कांग्रेस के शिव शंकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ (BJS) के अमरेंद्र बहादुर सिंह को 5,232 वोटों के अंतर से हराया।

हालांकि, उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।

विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।

1977 का चुनाव
1977 के चुनाव में सरेनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस की सुनीता चौहान विजयी हुईं। उन्होंने जनता पार्टी (JNP) के अमरेंद्र बहादुर सिंह को 3,479 वोटों के अंतर से हराया। 

1980 के चुनाव में कांग्रेस (आई) की सुनीता चौहान लगातार दूसरी बार विजयी हुईं। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के जय करण सिंह को 13,082 वोटों के अंतर से हराया।

सरेनी में पहली बार गैर-कांग्रेसी दल को मिली जीत 
1980 के बाद राज्य में 1985 के चुनाव हुए। इस चुनाव में रायबरेली की सरेनी विधानसभा सीट पर पहली बार कोई गैर-कांग्रेसी विधायक चुना गया। इस चुनाव में निर्दलीय सुरेंद्र बहादुर सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस की सुनीता चौहान को 33,354 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में सुरेंद्र बहादुर सिंह को 61,269 वोट, जबकि सुनीता चौहान को 27,915 वोट मिले।

1989: कांग्रेस ने की वापसी
हालांकि 1985 में पहली हार के बाद 1989 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की। इस चुनाव में कांग्रेस के इंद्रेश विक्रम विजयी हुए। उन्होंने जनता दल के अशोक कुमार को 11,370 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में इंद्रेश विक्रम को 45,577 वोट, जबकि अशोक कुमार को 34,207 वोट मिले।

इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत - फोटो : अमर उजाला
1991: सरेनी में भाजपा ने जीता पहला चुनाव
इसके बाद राज्य में 1991 का चुनाव हुआ। इस चुनाव में सरेनी विधानसभा सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के गिरीश नारायण पांडेय विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के इंद्रेश विक्रम सिंह को 510 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में गिरीश नारायण पांडेय को 22,795 वोट, जबकि इंद्रेश विक्रम सिंह को 22,285 वोट मिले।

1993: भाजपा ने दोहराई जीत
चुनाव में सरेनी विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के गिरीश नारायण पांडेय ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने समाजवादी पार्टी के अशोक कुमार को 1,881 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में गिरीश नारायण पांडेय को 36,835 वोट, जबकि अशोक कुमार को 34,954 वोट मिले।

1996: सरेनी सीट पर सपा की पहली जीत
1993 के चुनाव के बाद राज्य में 1996 के चुनाव हुए। इस चुनाव में सरेनी विधानसभा सीट पर पहली बार समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में अशोक कुमार सिंह विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के गिरीश नारायण पांडेय को 5,867 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अशोक कुमार सिंह को 47,863 वोट, जबकि गिरीश नारायण पांडेय को 41,996 वोट मिले।

2002: सपा ने दोहराई जीत
2002 के चुनाव में रायबरेली जिले की सरेनी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में सपा के देवेंद्र प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के अशोक कुमार सिंह को 6,244 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में देवेंद्र प्रताप सिंह को 32,837 वोट, जबकि अशोक कुमार सिंह को 26,593 वोट मिले।

1989 के बाद कांग्रेस ने जीता चुनाव
2007 के चुनाव में कांग्रेस ने सरेनी विधानसभा सीट पर वापसी करते हुए जीत दर्ज की। चुनाव में कांग्रेस के अशोक कुमार सिंह विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उमा शंकर को 23,329 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में अशोक कुमार सिंह को 53,938 वोट, जबकि उमा शंकर को 30,609 वोट मिले। वहीं, समाजवादी पार्टी के देवेंद्र प्रताप सिंह 29,993 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
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2022 का नतीजा - फोटो : अमर उजाला
2012: सपा ने की वापसी
इस चुनाव में सपा ने वापसी करते हुए एक बार फिर सीट पर कब्जा कर लिया। चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) के देवेंद्र प्रताप सिंह विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के सुशील कुमार को 12,919 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में देवेंद्र प्रताप सिंह को 61,666 वोट, जबकि सुशील कुमार को 48,747 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस (INC) के अशोक कुमार सिंह 47,593 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

2017: सरेनी सीट पर भाजपा की हुई वापसी
इस चुनाव में 1993 के बाद भाजपा ने सीट पर वापसी की। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के धीरेंद्र बहादुर सिंह विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के ठाकुर प्रसाद यादव को 13,007 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में धीरेंद्र बहादुर सिंह को 65,873 वोट, जबकि ठाकुर प्रसाद यादव को 52,866 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस के अशोक कुमार सिंह 42,232 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

2022: सपा ने मारी बाजी
इस चुनाव में रायबरेली जिले की सरेनी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के देवेंद्र प्रताप सिंह ने एक बार फिर वापसी करते हुए जीत दर्ज की। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के धीरेंद्र बहादुर सिंह को 3,807 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में देवेंद्र प्रताप सिंह को 66,166 वोट, जबकि धीरेंद्र बहादुर सिंह को 62,359 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस की सुधा द्विवेदी 42,702 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
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