अंबेडकर नगर की कटेहरी विधानसभा सीट 2022 के विधानसभा चुनाव में लालजी वर्मा की वजह से चर्चित सीटों में शामिल थी। लालजी वर्मा 2017 में यहां से बसपा के टिकट पर जीते थे। वर्मा 2022 में यहां से सपा के टिकट पर मैदान में उतरे। वर्मा कटेहरी से पहले टांडा विधानसभा सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं। इसके अलावा वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे। अलग-अलग सरकारों में उन्हें मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। 1997 में जेल विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) से लेकर 2002 में सार्वजनिक उद्यम और चिकित्सा शिक्षा विभाग तथा 2007 में संसदीय कार्य, चिकित्सा शिक्षा और वित्त जैसे विभाग संभालने तक उनका राजनीतिक सफर लंबा रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कटेहरी एक बार फिर चर्चा में है। ऐसे में हम आपको यूपी की सभी विधानसभा सीटों का इतिहास, राजनीतिक सफर और चुनावी गणित बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा अंबेडकर नगर जिले की इसी कटेहरी विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं कटेहरी सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला अंबेडकर नगर है। जिले में कुल पाँच विधानसभा सीटें हैं। इनमें- कटेहरी, टांडा, आलापुर, जलालपुर और अकबरपुर शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम अंबेडकर नगर जिले की कटेहरी विधानसभा सीट की बात करेंगे। कटेहरी विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1957 में अस्तित्व में आई थी। यहां के पहले विधायक लोक नाथ बने थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
कटेहरी विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
कटेहरी विधानसभा सीट के जातीय समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC) और कुर्मी आबादी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक हिस्सेदारी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 24% हैं। इसके बाद कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 12% और ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 12% है। वहीं, मुसलमान मतदाता लगभग 11%, यादव मतदाता करीब 7%, निषाद मतदाता लगभग 6% और क्षत्रिय मतदाता करीब 6% हैं। इसके अलावा वैश्य मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 4% है, जबकि बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और वर्गों से आते हैं।
कटेहरी विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
कटेहरी विधानसभा के पहले यानी 1957 के चुनाव में कांग्रेस के लोकनाथ विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी रघुनाथ को 3,945 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में लोकनाथ को 24,473 वोट, जबकि रघुनाथ को 20,528 वोट मिले।
1962: सोशलिस्ट पार्टी ने जीता चुनाव
इस चुनाव में कटेहरी विधानसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी के रघुनाथ सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के हिम्मत बहादुर को 3,050 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रघुनाथ सिंह को 18,113 वोट, जबकि हिम्मत बहादुर को 15,063 वोट मिले।
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- फोटो : अमर उजाला
1967: कांग्रेस ने पहली बार जीता चुनाव
इसके बाद राज्य में 1967, 1969 और 1974 में विधानसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में कटेहरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा। वर्ष 1967 के चुनाव में कटेहरी सीट से कांग्रेस के आर. नारायण (राम नारायण) विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी महादेव को 13,731 वोटों के अंतर से हराया।
कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
इसके बाद 1969 और 1974 के चुनावों में भी कटेहरी विधानसभा सीट से कांग्रेस के भगवती प्रसाद शुक्ल ने जीत दर्ज की। 1969 के चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल के देवी प्रसाद सिंह को 5,326 वोटों के अंतर से हराया, वहीं 1974 के चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल के ही हीरा सिंह को पराजित किया।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: पहली बार जीती जनता पार्टी
इस चुनाव में अंबेडकर नगर जिले की कटेहरी विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में जनता पार्टी के रविंद्र नाथ तिवारी विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के भगौती प्रसाद शुक्ला को 8,385 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रविंद्र नाथ तिवारी को 26,383 वोट, जबकि भगौती प्रसाद शुक्ला को 17,998 वोट मिले। वहीं, निर्दलीय राजबली यादव 6,392 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
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1980 का चुनाव
1980 के विधानसभा चुनाव में अंबेडकर नगर जिले की कटेहरी विधानसभा सीट से कांग्रेस (आई) के जिया राम शुक्ल 'विकल साकेती' विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के बाबू राम निषाद को 4,610 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जिया राम शुक्ल को 22,245 वोट, जबकि बाबू राम निषाद को 17,635 वोट मिले।
1985 में जनता पार्टी, 1989 में जनता दल मारी बाजी
इसके बाद राज्य में 1985 और 1989 के चुनाव हुए। इन दोनों चुनावों में कटेहरी विधानसभा सीट से रविंद्र नाथ तिवारी विजयी हुए। 1985 के चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की, तो वहीं 1989 के चुनाव में वह जनता दल के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने। 1985 में उन्होंने कांग्रेस के जय राम शुक्ल (विकल शकैती) को 5,528 वोटों के अंतर से हराया। वहीं 1989 के चुनाव में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राम देव वर्मा को महज 337 वोटों के बेहद करीबी अंतर से पराजित किया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में कटेहरी विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991: भाजपा ने पहली बार जीता चुनाव
इस चुनाव में कटेहरी विधानसभा सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की। चुनाव में भाजपा के अनिल कुमार तिवारी विजयी हुए। उन्होंने बसपा के राम देव वर्मा को 7,858 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती बसपा
इस चुनाव में कटेहरी विधानसभा सीट पर पहली बार बसपा ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के राम देव वर्मा विजयी हुए। उन्होंने भाजपा के अनिल कुमार तिवारी को 40,672 वोटों के बड़े अंतर से हराया।
इसके बाद राज्य में 1996, 2002 और 2007 के विधानसभा चुनाव हुए। इन तीनों चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के धर्मराज निषाद लगातार तीन बार विजयी हुए। 1996 के चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अनिल कुमार तिवारी को 5,764 वोटों के अंतर से हराया।
इसके बाद 2002 के चुनाव में धर्मराज निषाद ने समाजवादी पार्टी (सपा) के जय शंकर पांडेय को 4,121 वोटों के अंतर से पराजित किया। इस चुनाव में धर्मराज निषाद को 53,213 वोट, जबकि जय शंकर पांडेय को 49,092 वोट मिले। वहीं, समता पार्टी के डॉ. कमलेश कुमार त्रिपाठी 13,852 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2007: बसपा ने लगातार चौथा चुनाव जीता
2007 के चुनाव में धर्मराज निषाद ने एक बार फिर समाजवादी पार्टी के जय शंकर पांडेय को बेहद कड़े मुकाबले में महज 240 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में धर्मराज निषाद को 47,689 वोट, जबकि जय शंकर पांडेय को 47,449 वोट मिले। इस जीत के साथ धर्मराज निषाद ने कटेहरी में जीत की हैट्रिक लगाई।
2012: पहली बार जीती सपा
इस चुनाव में अंबेडकर नगर जिले की कटेहरी विधानसभा सीट पर पहली बार समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में सपा के शंखलाल मांझी विजयी हुए। उन्होंने बसपा के लालजी वर्मा को 17,620 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शंखलाल मांझी को 94,641 वोट, जबकि लालजी वर्मा को 77,021 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस के अमित 11,897 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022 का नतीजा
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2017: बसपा के साथ कटेहरी में लालजी वर्मा की सफल वापसी
इस चुनाव में कटेहरी की राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिला। लंबे राजनीतिक अनुभव और राज्य सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर काम कर चुके लालजी वर्मा ने अपनी पारंपरिक सीट टांडा छोड़कर कटेहरी विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। इस मुकाबले में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी अवधेश कुमार द्विवेदी को 6,287 वोटों के अंतर से हराया। लालजी वर्मा को कुल 84,358 वोट मिले, जबकि अवधेश कुमार द्विवेदी के खाते में 78,071 वोट आए। वहीं, समाजवादी पार्टी के जयशंकर पांडेय 45,532 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
2022: पार्टी बदली, लेकिन कटेहरी में कायम रहा लालजी वर्मा का दबदबा
2022 के विधानसभा चुनाव में लालजी वर्मा के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती थी। इस बार वे बहुजन समाज पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) के टिकट पर कटेहरी मैदान में उतरे। दल बदलने के बावजूद क्षेत्र के मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ वैसी ही बनी रही और उन्होंने लगातार दूसरी बार कटेहरी सीट से जीत हासिल की।
कड़े मुकाबले में लालजी वर्मा ने 'निषाद पार्टी' (निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल) के उम्मीदवार अवधेश कुमार को 7,696 वोटों के अंतर से पराजित किया। चुनाव में लालजी वर्मा को कुल 93,524 वोट मिले, जबकि अवधेश कुमार को 85,828 वोट मिले। बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी प्रतीक पांडेय 58,482 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2024 में हुआ उपचुनाव, भाजपा ने 33 साल बाद की वापसी
2022 के चुनाव के बार कटेहरी विधानसभा सीट पर 2024 में उपचुनाव हुए। दरअसल 2022 के चुनाव में कटेहरी सीट से समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता लालजी वर्मा विधायक चुने गए थे। इसके बाद, 2024 के लोकसभा चुनाव में वे अंबेडकरनगर संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। लोकसभा सदस्य बनने के कारण नियमानुसार उन्हें कटेहरी विधानसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे से यह सीट रिक्त हो गई, जिसके चलते यहां उपचुनाव कराया गया। इस उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के धर्मराज निषाद ने जीत हासिल की। उन्होंने समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी और लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती वर्मा को 34,514 वोटों के अंतर से हराया।