हरियाणा की सभी दस लोकसभा सीटों के लिए शनिवार को वोट डाले जाएंगे। प्रदेश की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। भाजपा ने 2019 में सभी दस सीटों पर जीत का परचम लहराया था। कांग्रेस का प्रयास है कि इस बार कम से कम आधी सीटें भाजपा से छीन ली जाएं। इसके लिए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर भरोसा किया है। लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक, हुड्डा का दबदबा साफ दिखाई पड़ रहा है। अब यह सवाल उठता है कि कांग्रेस पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव में हुड्डा को फ्री हैंड दे दिया तो क्या हरियाणा भी 'भूपेंद्र सिंह हुड्डा' की पगड़ी की लाज रखेगा।
हरियाणा में लोकसभा चुनाव की रणनीति तैयार करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने भूपेंद्र हुड्डा को फ्री हैंड दे दिया था। पार्टी 9 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट, इंडिया गठबंधन के तहत आम आदमी पार्टी के खाते में गई है। कांग्रेस ने सात सीटों पर जो उम्मीदवार उतारे हैं, उनके नाम हुड्डा की लिस्ट से लिए गए हैं। चुनाव प्रचार भी हुड्डा के मन मुताबिक चला है। हुड्डा ने अपने सर्वे के आधार पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भरोसा दिलाया था कि वे इस बार ज्यादा से ज्यादा सीटें पार्टी की झोली में डाल सकते हैं। प्रदेश कांग्रेस में लंबे समय से गुटबाजी चल रही थी। हुड्डा के सामने कुमारी शैलजा, रणदीप सुरजेवाला और किरण चौधरी, जिसे 'एसआरके' गुट कहा जाता है, खड़ा रहा है।
कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में इस गुट को ज्यादा तव्वजो नहीं दी। कुमारी शैलजा को सिरसा सीट से टिकट दे दिया गया। इस मामले में भी पार्टी नेतृत्व ने हुड्डा को विश्वास में लिया था। पार्टी नेतृत्व के पास यह मैसेज पहुंच चुका था कि चार महीने बाद प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में अगर दमदार प्रदर्शन करना है, तो उसके लिए लोकसभा चुनाव में हुड्डा को आगे करना होगा। हुड्डा के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने बीते दिनों, भाजपा की नायब सैनी सरकार को समर्थन देने वाले तीन निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में कर लिया था। उनके इस कदम में प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया। हुड्डा ने कहा, अब भाजपा सरकार अल्पमत में आ गई है। उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा ने कांग्रेस के विधायकों में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश की है, लेकिन अभी तक तीस में से एक भी विधायक नहीं हिला है। इसके विपरित हुड्डा ने तीन निर्दलीय विधायकों को कांग्रेस के पाले में लाकर भाजपा सरकार को मुश्किल में डाल दिया।
अगर लोकसभा चुनाव में भूपेंद्र हुड्डा, भाजपा से आधी सीटें छीनने में कामयाब हो गए, तो उनका कद और ज्यादा बढ़ जाएगा। हुड्डा ने यह चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा है। दूसरी तरफ भाजपा, मोदी की गारंटी के भरोसे लोगों के बीच गई है। भाजपा ने राम मंदिर, अनुच्छेद 370, पांच प्रधानमंत्री और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाया है। हुड्डा ने प्रदेश में बेरोजगारी, अग्निपथ योजना, प्रदेश के युवाओं का पलायन और किसानों के मुद्दे उठाए।
भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को हटाकर नायब सैनी को मुख्यमंत्री बनाया, तो हुड्डा ने इस मुद्दे को हाथों हाथ कैश कर लिया। उन्होंने कहा, भाजपा ने एंटी इंक्मबेंसी फैक्टर के चलते खट्टर को हटाया है। प्रदेश की जनता अब भाजपा को माफ नहीं करेगी। भाजपा ने नौकरियों में ईमानदारी बरतने की बात लोगों के सामने रखी, लेकिन खट्टर सरकार उसे भुना नहीं पाई। अब चार जून के नतीजे ही बताएंगे कि लोगों ने हुड्डा की पगड़ी की लाज रखी है या मोदी की गारंटी पर भरोसा किया है।