2002 में बुसान एशियाई खेलों के साथ अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत की। 2004 के एथेंस पैरालंपिक खेलों में जेवलिन थ्रो में गोल्ड जीता। इस बीच कैंसर ने पिता को छीन लिया। लेकिन, देवेंद्र खेल के मैदान में टिके रहे। यहां तक कि पिता के जीवन के आखिरी लम्हों में भी उनके साथ नहीं रह पाए। झाझरिया खेल कोटे से रेलवे के कर्मचारी हैं। जयपुर में रहते हैं। पर, उनका संघर्ष युवाओं को सहज ही प्रेरित करता है। चूरू सीट को भाजपा की झोली में डालने वाले कस्वां परिवार की बगावत और मौजूदा सांसद राहुल कस्वां के कांग्रेस में शामिल होने के बाद संकट से निकलने के लिए पार्टी ने झाझरिया पर भरोसा जताया है।
हर संकट से नायक की तरह निकले
2008 और 2012 के पैरालंपिक खेलों में जब भाला फेंक को शामिल नहीं किया गया, तो निराश होकर खेल छोड़ने का मन बना लिया था। तब उनकी पत्नी और राष्ट्रीय स्तर की कबड्डी खिलाड़ी मंजू ने हौसला बढ़ाया। नतीजा यह निकला कि 2016 के रियो पैरालिंपिक खेलों में उन्होंने फिर गोल्ड मेडल जीता। वे 2020 के टोक्यो पैरालंपिक में सिल्वर और आईपीसी विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड जीत चुके हैं। वे भारतीय पैरालंपिक समिति के अध्यक्ष भी बनने वाले हैं।
कस्वां की चुनौती भाजपा की आपदा बनी झाझरिया के लिए अवसर
चूरू भाजपा का गढ़ रहा है। 1991 से 2019 तक सिर्फ तीन वर्ष के लिए यह सीट कांग्रेस के पास रही। 11 मार्च को राहुल कस्वां कांग्रेस में चले गए। भाजपा के लिए यह आपदा जैसी स्थिति बनी, जो झाझरिया के लिए बड़ा अवसर लेकर आई है। चूरू में खेल, सेना व पुलिस युवाओं के पसंदीदा कॅरिअर विकल्प हैं। झाझरिया को यहां खूब सम्मान मिलता है और भाजपा को इसी सम्मान से वोटों की उम्मीद है।