भारत जैसे विशाल देश में औसतन हर छह महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। लोकसभा चुनाव में डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपये तक खर्च होने का अनुमान है। पंचायत, नगर निगम और विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक में हर साल औसतन 70 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। चुनाव प्रबंधन से जुड़े नौ एक्सपर्ट के मुताबिक कंपनियों के बिजनेस के लिहाज से चुनाव का सालाना बाजार कम से कम 45 हजार करोड़ रुपये का है। यानी 70 हजार करोड़ की इस राशि में सबसे बड़ा हिस्सा चुनाव प्रचार का है।
तीन हिस्सों में हैं स्टार्टअप
कॉरपोरेट से भी महंगी हो गई राजनीति
चुनाव प्रबंधन से जुड़े युवाओं का साफ कहना है, हमने मतदाता के मूड को समझने का रास्ता आसान कर दिया है। पर, यह भी सच है कि राजनीति के कॉरपोरेट की तरह काम करने से यह महंगी हो गई है। यही नहीं मोनोपोली भी बनती जा रही है। कॉरपोरेट पॉलिटिक्स में जिसकी जेब में पैसा है, आज वही राजनीति में आ रहे हैं और टिक रहे हैं। उनका यह भी मानना है कि कंसल्टेंसी ने भारतीय राजनीति को और ज्यादा भ्रष्ट बनाया है।
अच्छा राजनेता बनाने के लिए कोर्स भी
इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी में 150 से ज्यादा अच्छा राजनेता बनने का पाठ पढ़ रहे हैं। शी कोर्स केवल महिलाओं के लिए है, जो एक हफ्ते का है। डेमोक्रेसी एक्सेल दस दिन का कोर्स है। गुड पॉलिटिशयन नौ महीने का कोर्स है। हर तिमाही में दो हफ्ते का प्रोग्राम है। फैकल्टी में पूर्व एमपी और एमएलए हैं। ये प्रयास सैद्धांतिक राजनीति को बचाने के मकसद से शुरू किया गया है। ---प्रखर भरतिया, को-फाउंडर, आईएसडी (इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी)
नेताओं का होमवर्क आसान हो गया
दस साल पहले राजनीतिक दलों में चुनाव प्रबंधन को लेकर खास दिलचस्पी नहीं थी। सभी की अपनी टीम होती थी, लेकिन अब यह काम आउटसोर्स हो रहा है। डाटा से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तक की फीस है। इसके दम पर राजनीतिक हस्तियां अपना होमवर्क मजबूत करके बाहर निकल रही हैं। हालांकि इस वजह से चुनाव महंगे भी हो गए हैं।