आधे से कुछ ज्यादा मुस्लिम मत यहां रुख बदलने की ताकत रखता है। बदले माहौल में वे पहले से ज्यादा एकजुट हैं, क्योंकि पिछले चुनाव में बंटने का हश्र देख चुके हैं। कांग्रेस व तृणमूल में वोट बंटवारे का लाभ भाजपा प्रत्याशी उठा ले गया। इस बार इमामों की जमात वोट न बंटने देने के लिए अपील कर सकती है। हालांकि मुस्लिम बहुत सीट सागरदिघी विस क्षेत्र के उपचुनाव में अपनी हार से तृणमूल बेफिक्र नहीं है।
यहां 93.65% ग्रामीण और 6.35% शहरी आबादी है। एससी 23.44 व एसटी 10.13 फीसदी है। परिणामों पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा की छलांग सबसे ऊंची है। 2009 में भाजपा का मत प्रतिशत मात्र 6.67 फीसदी था, 2014 में बढ़कर 15.39% तक पहुंच गया। 2019 में तो पार्टी ने सभी को चौंकाते हुए मत प्रतिशत बढ़ाकर 37.61% कर लिया और ऐन चुनाव के वक्त माकपा से भाजपा में आए खगेन मुर्मू ने गनी खान परिवार की तृणमूल प्रत्याशी मौसम नूर को 85 हजार वोटों से शिकस्त दे दी। कांग्रेस का गढ़ रही इस सीट के सात विधानसभा क्षेत्रों में से चार पर टीएमसी और तीन पर भाजपा का कब्जा है।
कमजोर हो रहा कांग्रेस का गढ़
गनी खान चौधरी का नाम अब भी यहां चलता है। इसी कारण इसे कांग्रेस का गढ़ कहते हैं। इस मिथक को भाजपा के कुशल रणनीतिकारों ने ध्वस्त कर दिया। पिछली बार उतरे उनके भतीजे ईशा खान ने इस बार सीट बदलकर दक्षिण मालदा कर ली। उनकी भतीजी मौसम भी यहां से प्रत्याशी थी, लेकिन इस बार इस सीट पर गनी परिवार का कोई नहीं है।
वोटर के मन में मोदी-दीदी दोनों
बस स्टैंड के सामने चाय की दुकान चलाने वाले दीपक सिंहो ने मोदी का कैलेंडर टांग रखा है। बोले, मोदी की बात पसंद है। ममता की लोकप्रिय लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाओं के जिक्र पर कहते हैं- दीदी हमसे पैसा लेकर हमको ही तो देती है।