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Election 2024: इस बार किसे मिलेगा हिमालय का आशीर्वाद, 2019 में 40 सीटों में से 25 पर लहराया था भगवा

Mon, 25 Mar 2024 05:59 AM IST
जलज मिश्रा नितीश मिश्र, नई दिल्ली

सार

देश की सुरक्षा में सीना तानकर खड़े हिमालय की गोद में बसे राज्य भी देश की सियासत की दिशा तय करते हैं। लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर तक करीब 2,400 किमी की लंबाई में फैले हिमालयी क्षेत्रों के 10 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों को मिलाकर हैं तो 40 लोकसभा सीटें ही, मगर सियासी रूप से बेहद अहम हैं ...यहां पुराना प्रदर्शन बरकरार रखना भाजपा के लिए चुनौती है, तो विपक्ष की राह भी कांटों भरी।
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राहुल गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमालयी राज्य में लोकसभा की सीटें संख्या के हिसाब से भले ही कम हैं, मगर सियासी प्रभाव बहुत ज्यादा है। पिछले चुनाव में इस क्षेत्र की 40 सीटों में 25 सीट पर भगवा लहराया था। मगर, बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार भी वह अपना प्रदर्शन दोहरा पाएगी। इस बार भाजपा अकेले दम पर 370 पार का नारा लेकर चुनाव मैदान में उतरी है। उसके इस अभियान में हिमालय राज्यों का प्रदर्शन बेहद अहम हो सकता है। वैसे भी, विपक्ष इस बार भाजपा को रोकने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है। मणिपुर को देखिए। है तो यहां सिर्फ दो संसदीय सीटें, लेकिन यहां की सियासत पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों को भी प्रभावित करती है। संभवत: यही वजह है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने न्याय यात्रा की शुरुआत मणिपुर से की और असम के साथ पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा को घेरने की कोशिश की।

हिमालयी समाज, संस्कृति के बीच केंद्र शासित प्रदेशों लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, अरुणाचल, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर,नगालैंड और सिक्किम में लोकसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं। हर राज्य के अलग-अलग मुद्दे हैं...राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय तक। देखना है कि मतदाता किसे महत्व देते हैं।

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जम्मू-कश्मीर : 370 खत्म होने के बाद पहला चुनाव
अनुच्छेद-370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पहला चुनाव होने जा रहा है। यह चुनाव क्षेत्रीय दलों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसे दलों की प्रासंगिकता तय करेगा, तो भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा भी दांव पर रहेगी। फारुख अब्दुल्ला की अगुवाई वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी भाजपा को रोकने के लिए जनता से 370 को हटाकर राज्य को पहुंचाने नुकसान के लिए सबक सिखाने का आह्वान कर रहे हैं। गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व वाली डीपीएपी इस समय जम्मू कश्मीर की राजनीति में अपने लिए संभावनाएं तलाश रही है। कांग्रेस न सिर्फ कश्मीर, बल्कि जम्मू संभाग में भी अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत है।

यहां की पांच में से तीन सीटों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस का कब्जा है। दो भाजपा के पास है। परिसीमन के बाद जम्मू और कश्मीर दो पूर्ण सीट हैं। जम्मू व कश्मीर दोनों संभाग को मिलाकर अनंतनाग-राजोरी सीट बनाई गई है। यह सीट सबसे चर्चित रहने वाली है। इस सीट में राजोरी-पुंछ के हिंदू तथा पहाड़ी व गुज्जर वोटर भी जुड़ गए हैं। पहाड़ी आरक्षण देकर भाजपा इन्हीं वोटरों के सहारे नैया पार लगाने में जुटी है।
2019 के नतीजे : नेशनल कॉन्फ्रेंस 3 (वोट-7.9%), भाजपा 3 (वोट-46.4%)
 

लद्दाख : पूर्ण राज्य की मांग ने गरमाई सियासत
जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्रशासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आए लद्दाख की आकांक्षाएं तेजी से बदली है। यहां की एकमात्र सीट पर पिछली बार भाजपा ने जीत दर्ज की थी। इस बार कुछ स्थानीय मुद्दे उसे परेशान कर सकते हैं। स्थानीय लोगों के दिल में पूर्ण राज्य को लेकर उम्मीद की किरण जगी है। केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। सड़कों पर रैलियां निकाली गईं। पर्यावरण विद सोनम वांगचुक तो पूर्ण राज्य के लिए एक पखवारे से अनशन पर बैठे हैं। विपक्ष इस मुद्दे पर भाजपा को लगातार घेरने में जुटा है। हालांकि राष्ट्रवाद और चीन को लगातार आंख दिखने की रणनीति के साथ भाजपा विपक्ष के तेवर को कुंद करने में जुटी है।
सीट 1 : 2019 और 2014 में भाजपा (वोट 33.94%) जीती। (पहले यह सीट जम्मू-कश्मीर राज्य में थी। अब लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश है।)
 

उत्तराखंड : यूसीसी का असर दिखना तय
देश में सबसे पहले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर उत्तराखंड में भाजपा ने हिंदुओं को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की है। पिछली बार पांच सीटें जीतने वाली भाजपा का ग्राफ कमजोर होता नहीं दिख रहा है। हालांकि यूसीसी लागू होने के बाद मुस्लिम पक्ष भी एकजुट हुआ है। हल्द्वानी हिंसा ने दोनों पक्षों के बीच की खाई को और चौड़ा किया। विपक्ष यूसीसी को लेकर लगातार विरोध करता रहा है। वहीं, भाजपा डबल इंजन सरकार के चलते आश्वस्त नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हजारों करोड़ की विकास की परियोजनाएं दे चुके हैं। सिल्क्यारा सुरंग कांड में भी सभी श्रमिकों की सकुशल वापसी कराकर सरकार ने पक्ष में माहौल बनाया है।
2019 के नतीजे : सभी भाजपा (वोट 61%), कांग्रेस को वोट 31.40%

हिमाचल : राज्यसभा चुनाव ने कांग्रेस की चुनौती बढ़ाई
पिछले चुनाव में चारों सीटों कब्जा करने वाली भाजपा के लिए चुनौती आसान नहीं रहने वाली। पुरानी पेंशन व रोजगार गारंटी समेत महिलाओं के मुद्दे पर 2022 का विधानसभा चुनाव जीत सत्ता में लौटी कांग्रेस ने भाजपा के सामने नई चुनौती रख दी। हालांकि हाल में हुआ राज्यसभा चुनाव भाजपा की ताकत का अहसास करा गया। कांग्रेस से अभिषेक मनु सिंघवी मैदान में थे। पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद कांग्रेस के छह विधायक बागी हो गए और भाजपा अपने प्रत्याशी हर्ष महाजन को जिताने में कामयाब रही। इस बीच, शनिवार को सभी छह बागी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। इससे भाजपा और मजबूत हुई है।
2019 के नतीजे : सभी भाजपा (वोट 69.11%), कांग्रेस को वोट 27.3%

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पूर्वोत्तर में सभी ने लगाया दम, सहयोगी बनेंगे खास
पूर्वोत्तर के आठ राज्य असम, अरुणाचल, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और सिक्किम उग्रवाद के साए में सांस लेते रहे हैं। भाजपा की सरकार बनने के बाद इसमें काफी कमी आई है। गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में राज्य सरकारों ने उग्रवादी संगठनों के साथ कई समझौते किए। हालांकि, महीनों तक चली मणिपुर हिंसा से भाजपा की लोकप्रियता पर असर पड़ा है, तो विपक्ष को भी अपनी जमीन तलाशने का मौका मिला। भाजपा मणिपुर, मेघालय और नगालैंड में उम्मीदवार न उतारकर सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियों को समर्थन दे रही है। इन तीनों राज्यों की पांच सीटों पर 19 अप्रैल को वोटिंग होगी।

पिछले चुनाव में इन आठ राज्यों की 25 सीटों में भाजपा और सहयोगियों के खाते में 18 सीटें आई थीं। 2014 में भाजपा को सिर्फ आठ सीटें मिली थीं। वर्तमान में भाजपा असम, त्रिपुरा में अकेले दम पर, जबकि मेघालय, नगालैंड, सिक्किम और अरुणाचल में क्षेत्रीय दलों के गठबंधन के साथ सत्ता में है। सिर्फ मिजोरम में भाजपा से इतर जोरम पीपुल्स मूवमेंट की सरकार है। जाहिर है कि विपक्ष के लिए पूर्वोत्तर की राह पिछली बार से कुछ कम कठिन नहीं है।
2019 के नतीजे : भाजपा 18, कांग्रेस व सहयोगी 7

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