भाजपा सांसद वरुण गांधी इन दिनों चर्चा में हैं। पीलीभीत से सांसद वरुण गांधी क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से चुनाव लड़ सकते हैं? क्या उन्हें कांग्रेस और सपा का समर्थन मिल सकता है? वरुण और उनकी मां मेनका गांधी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में क्या संभावनाएं हैं? वरुण गांधी कांग्रेस में आते हैं तो राजनीतिक समीकरण कितने बदलेंगे?
इस हफ्ते के 'खबरों के खिलाड़ी' में इन्हीं सवालों पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
पूर्णिमा त्रिपाठी: पिछले काफी समय से वरुण गांधी भाजपा से दूरी बनाकर चल रहे हैं। अखबारों में उनके कई लेख छपे हैं, जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं। वरुण गांधी की अपने भाई राहुल गांधी और बहन प्रियंका गांधी से जो नजदीकियां रही हैं, वो किसी से छुपी नहीं हैं। वरुण गांधी के लिए भाजपा से टिकट मिलने की संभावना नहीं दिख रही है। उनकी मां मेनका को भाजपा टिकट देगी, इसकी संभावना भी नहीं दिख रही है।
जहां तक रायबरेली की बात है तो प्रियंका अगर वहां से लोकसभा चुनाव लड़ती हैं तो यह अच्छा संकेत होगा। अमेठी के लिए मुझे लगता है कि राहुल गांधी तो इस बार नहीं लड़ेंगे। वरुण हो सकते हैं, जैसी चर्चा चल रही है। इसमें देखना होगा कि गांधी परिवार क्या उन्हें आगे करता है?
रामकृपाल सिंह: यह बड़ी राजनीतिक घटना नहीं होगी कि वरुण अमेठी से चुनाव लड़ते हैं या नहीं। राजनीतिक घटना तब बड़ी होगी, अगर वरुण गांधी कांग्रेस में जाते हैं। अब वो दौर खत्म हो गया, जब कहा जाता था नाम बड़ा है और उम्मीदवार जीत जाते थे। मेरा कहना है कि जब कांग्रेस की ओरिजिनल कॉपी नहीं चल पा रही है तो डुप्लिकेट कॉपी कितनी चलेगी? कांग्रेस की जहां तक बात है तो आसन्न पराजय को देखते हुए या तो व्यक्ति लंबी लड़ाई के लिए तैयारी करता है या फिर अवसाद में चला जाता है। कांग्रेस अवसाद की स्थिति में जाती दिख रही है।
विनोद अग्निहोत्री: वरुण गांधी की जहां तक बात है तो बड़ी घटना वही होगी, जब वो कांग्रेस में जाते हैं। मैं यह नहीं कहूंगा कि वो डुप्लिकेट हैं। उनका इंदिरा गांधी से वही संबंध है, जो राहुल का है। आज अगर वो कांग्रेस में जाते हैं तो वो उनका एक स्वाभाविक कदम होगा। 2019 में भी उनके टिकट पर बड़ा संशय था। उसके बाद भी उन्हें और उनकी मां को टिकट मिला। इस बार यह चीज दोहराई जाएगी, इस पर बड़ा संशय है। जिस तरह पीलीभीत में उनकी सक्रियता है, उसे देखते हुए मुझे लगता है कि अगर वे निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं तो भी पीलीभीत से ही लड़ेंगे। हां, ये जरूर है कि अगर वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं तो जरूर अमेठी से लड़ सकते हैं। वरुण गांधी का जो उपयोग भाजपा में था, शायद अब उनकी वह उपयोगिता रही नहीं है। ऐसे में भाजपा उनकी ज्यादा परवाह नहीं कर रही है।
अनुराग वर्मा: जब भी भारतीय राजनीति में किसी के नाम के आगे गांधी सरनेम लगा है, उसने अपना स्तर प्रधानमंत्री से नीचे नहीं देखा है। उसके उदाहरण हमारे सामने हैं, जब गांधी सरनेम के नेता पीएम रहे। जो नहीं रहे, उनके साथ सुपर पीएम तक लगा। उसका उदाहरण एक और है कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री का अध्यादेश फाड़कर फेंक दिया था। वही, स्थिति वरुण गांधी के साथ है। यह एक तरह से एक दरवाजा बंद करके एक दरवाजा खुला रखने की कोशिश है। या यूं कहें कि यह एक तरह की 'आर्म ट्विस्टिंग' की कोशिश हो रही है।
मुझे जो लगता है कि हम जो वरुण गांधी को कांग्रेस में आने की चर्चाएं कर रहे हैं, उसमें सबसे बड़ी चुनौती आएगी कि क्या सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उन्हें एक और गांधी के रूप में स्थापित करना चाहेंगे। इस परिवार को यह भी डर हो सकता है कि कहीं वह पार्टी को हाईजैक न कर लें।