पिछले लोकसभा चुनाव में गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया जिस तरह हारे, उससे वे आज तक उबर नहीं पाए। हार के जख्म को भरने के लिए समय के साथ उनका तेवर और अंदाज सब बदल गया है। गांव से लेकर शहर की गलियों तक में घूम रहे हैं। लोगों से शक्ति मांग रहे हैं। विनम्रता से सबकी बात सुन रहे हैं। बेहद सधे अंदाज में एक-एक कदम बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस ने सिंधिया के मुकाबले युवा प्रत्याशी यादवेंद्र राव को उतारा है।
राव को यादव, मुस्लिम सहित अन्य जातियों का समर्थन मिल रहा है। राव खुद हर इलाके में जाकर वोट मांग रहे है। इस सीट का शहरी वोटर खुलकर मोदी, राम मंदिर और अनुच्छेद 370 की बात कर रहा है। गांव और शहर की महिलाएं लाडली बहना और राशन योजना की भी चर्चाएं करतीं नजर आती हैं। जिन महिलाओं को लाडली बहना का लाभ नहीं मिल रहा, वे नाराज भी दिख रही हैं, लेकिन संख्या बहुत कम है। इस लोकसभा क्षेत्र में गुना, शिवपुरी, और अशोक नगर जिले की आठ विधानसभा सीटें हैं-गुना, बमोरी, शिवपुरी, कोलारस, पिछोर, चंदेरी, मुंगावली और अशोकनगर। बमोरी व अशोकनगर में कांग्रेस है। बाकी छह पर भाजपा।
आंकड़ों के लिहाज से तो भाजपा भारी है, लेकिन मौजूदा सांसद केपी यादव का टिकट कटने से यादव वोटर नाराज है। मुंगावली, अशोकनगर, चंदेरी और कोलारस में इस समाज का प्रभाव ज्यादा है। इसका लाभ उठाने के लिए कांग्रेस नेता अपने भाषणों में केपी यादव के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं। हालांकि इसके काउंटर में सिंधिया ने सीएम मोहन यादव की सभा भी कराई, लेकिन ज्यादा असर नहीं हुआ। गुना में जाटव, यादव, लोधी, रघुवंशी और गुर्जर सर्वाधिक प्रभावशाली हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में इन जातियों के एकजुट होने के कारण ही ज्योतिरादित्य को हार का सामना करना पड़ा था। रघुवंशी सामान्य वर्ग में आते हैं, जबकि यादव और लोधी समाज ओबीसी में हैं। वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय सहित अन्य समाज के वोटर भी निर्णायक रहेंगे।
गुना का सियासी इतिहास
गुना संसदीय सीट सिंधिया परिवार की परंपरागत सीट रही है। यहां 18 बार आम चुनाव और उपचुनाव हुए। इसमें से 14 बार यह सीट सिंधिया परिवार के पास रही। 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में वीजी देश पांडे हिंदू महासभा से, 1962 में राम सहायक पांडे और 1984 में महेंद्र यादव कांग्रेस से सांसद निर्वाचित हुए थे। पहले विजयाराजे सिंधिया, फिर उनके बेटे माधव राव सिंधिया और चार बार ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद रहे। 2019 में पीएम मोदी की लहर में ज्योतिरादित्य भाजपा के केपी यादव से हार गए। हालांकि कुछ माह बाद ही वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।
विधायकी का चुनाव हार गए थे यादवेंद्र
यादवेंद्र राव विधानसभा चुनाव में मुंगावली से भाजपा के ब्रजेंद्र यादव से हार गए थे। हालांकि लोकसभा चुनाव में कुछ अलग ही माहौल है। रोचक यह कि यादवेंद्र के पिता राव देशराज सिंह यादव भाजपा से तीन बार विधायक रहे। सिंधिया के खिलाफ भाजपा से दो बार सांसदी का चुनाव भी लड़ा। अब कांग्रेस से उनका बेटा सिंधिया के खिलाफ मैदान में है, जबकि यादवेंद्र का पूरा परिवार भाजपा में है।
यादवेंद्र के लिए अभी तक कांग्रेस का कोई बड़ा चेहरा चुनाव प्रचार करने के लिए नहीं आया, जबकि सिंधिया के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती, सीएम मोहन यादव प्रचार कर चुके हैं। यह पहला मौका है कि जब सिंधिया के पक्ष में हवा बनाने के लिए बड़े चेहरे प्रचार में कूदे हैं। हालांकि उनकी बुआ और शिवपुरी से लंबे समय तक विधायक रहीं यशोधरा राजे के चुनाव से दूरी की भी चर्चाएं हो रही है।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019 में यहां से भाजपा ने केपी यादव को उतारा था, उन्हें तब 52.1 प्रतिशत मत मिले थे। वहीं उनके मुकाबले में कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनावी मैदान में थे। उस चुनाव में उनके पक्ष में 42.5 प्रतिशत मत ही पड़े थे। वहीं बात अगर 2014 के लोकसभा चुनाव की करें तो तब कांग्रेस से चुनावी मैदान में उतरे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 52.9 प्रतिशत मत पाकर जीत दर्ज की थी। जबकि उनके मुकाबले में भाजपा के जेएस पवैया को महज 40.6 प्रतिशत ही मत मिले थे। हालांकि 2019 में हार के बाद ज्योतिरादित्य भाजपा में शामिल हो गए।