पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार दल मत%
वाई देवेंद्रप्पा भाजपा 49.22
वीएस उगरप्पा कांग्रेस 47.09
2014
बी. श्रीरामुलु भाजपा 51.09
एनवाई हनुमनथप्पा कांग्रेस 42.95
भाजपा-कांग्रेस के अपने-अपने समीकरण
वर्ष 2009 से सुरक्षित श्रेणी में गई बेल्लारी सीट पर 21 फीसदी से अधिक दलित और 18 फीसदी से ज्यादा आदिवासी मतदाता हैं। इनकी एकजुटता किसी का भी खेल बनाने-बिगाड़ने में सक्षम है। इनमें लाभार्थी वर्ग अधिक है। यहां लिंगायत व शेट्टी समुदाय के मतदाता अच्छी संख्या में हैं, जो चुनाव का रुख तय करते हैं। शहर के सराफा व्यवसायी जयंतीलाल के अनुसार, पिछले चुनावों में भाजपा की लगातार जीत इन्हीं समीकरणों से तय होती आई है। इसके पीछे वह रेड्डी बंधुओं की भूमिका को भी कम नहीं आंकते। कांग्रेस को उम्मीद है कि मुस्लिमों के साथ दलित और आदिवासी मतों के सहारे वह अपनी हार का सिलसिला तोड़ने में कामयाब हो सकती है। यहां लगभग दो लाख मुस्लिम मतदाता हैं। इसके अलावा प्रदेश सरकार की गारंटियों का सहारा है। ट्रैवल एजेंट मीरा शेख कहते हैं कि भाजपा ने इस क्षेत्र को रेड्डी बंधुओं के हवाले कर दिया था। खनन घोटाले में फजीहत होने पर उनसे किनारा तो किया, पर फिर से पार्टी में शामिल कर लिया।
विस चुनाव के आंकड़ों में कांग्रेस 6-2 से आगे
लोकसभा चुनावों में भले ही कांग्रेस के हिस्से लगातार हार आई हो, लेकिन पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में वह आठ में से छह सीटें जीतकर सबसे आगे रही। भाजपा और जदएस के खाते में दो-दो सीटें ही आई थीं।
जिस मुकाबले की देशभर में हुई थी चर्चा
1999 में सोनिया गांधी के बेल्लारी से चुनाव मैदान में उतरने पर भाजपा ने सुषमा स्वराज को प्रत्याशी बनाकर उनकी कड़ी घेरेबंदी कर दी थी। इस चुनाव में सुषमा का हेलिकॉप्टर से आकर आखिरी दिन नामांकन करने की भी खूब चर्चा रही। सोनिया लगभग 55 हजार वोटों से जीतीं थीं। हालांकि, बाद में उन्होंने बेल्लारी सीट छोड़ दी थी। इसके बाद 2000 और 2018 में हुए उपचुनाव में ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई।
अवैध खनन में आंध्र प्रदेश के रास्ते बेल्लारी में दाखिल हुए थे रेड्डी बंधु
बेल्लारी शहर से उत्तर दिशा में महज 16 किमी दूर आंध्रप्रदेश की सीमा पर स्थित लाल-काली पहाड़ियां रेड्डी बंधुओं के काले कारोबार की गवाही देती हैं। वर्ष 2001 में आंध्र के मुख्यमंत्री रहे वाईएसआर रेड्डी से अच्छे संबंधों का फायदा उठाकर रेड्डी बंधुओं ने 10 लाख की लागत से माइनिंग कंपनी शुरू की थी। इस बीच, 1999 के लोकसभा चुनाव से भाजपा के नजदीक आए रेड्डी बंधु कर्नाटक की सियासत में भी सिक्का जमा चुके थे। खनन घोटाले उजागर होने के बाद आई रिपोर्ट में सामने आया था कि महज पांच साल में उनकी कंपनी का टर्नओवर तीन हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
स्थानीय लोग बताते हैं कि रेड्डी बंधुओं ने आंध्र के लाइसेंस पर सीमा से सटे कर्नाटक में अवैध रूप से खनन शुरू कर सैकड़ों ग्रामीणों को बेघर किया और सरकार को हजारों करोड़ों का नुकसान पहुंचाया। आंध्र की सीमा से सटे बेडेगलटांडा गांव के आसपास रेड्डी बंधुओं की मनमानी के निशान अब भी देखे जा सकते हैं। इलाके में चुनावी माहौल भांपने की कोशिश को भी ग्रामीण खनन में लगी कंपनियों का कर्मचारी मानकर घेर लेते हैं। कई बड़ी कंपनियों का नाम लेकर अपनी जमीन हथियाने का आरोप भी लगाते हैं।