दक्षिण भारत में भाजपा कांग्रेस से आगे थे क्षेत्रीय दल
दक्षिण भारत से कुल 132 सांसद चुनकर आते हैं। दक्षिण भारत की ये सीटें तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार जैसे कुल आठ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में 132 में से कांग्रेस और भाजपा दोनों ने 29-29 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं इन दलों से काफी आगे क्षेत्रीय पार्टियों के 74 सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे थे।
| राज्य |
सीटें |
भाजपा |
कांग्रेस |
अन्य |
| तमिलनाडु |
39 |
0 |
8 |
31 |
| कर्नाटक |
28 |
25 |
1 |
2 |
| आंध्र प्रदेश |
25 |
0 |
0 |
25 |
| तेलंगाना |
17 |
4 |
3 |
10 |
| केरल |
20 |
0 |
15 |
5 |
| पुडुचेरी |
1 |
0 |
1 |
0 |
| लक्षद्वीप |
1 |
0 |
0 |
1 |
| अंडमान निकोबार |
1 |
0 |
1 |
0 |
| |
132 |
29 |
29 |
74 |
इस राज्य में खोला खाता
दक्षिण भारत के पांच राज्यों तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में से सिर्फ एक कर्नाटक ही ऐसा है, जहां भाजपा सरकार भी चला चुकी है। भाजपा को 2019 के चुनाव में इन पांच राज्यों 129 सीटों में से 29 पर जीत मिली थी। हालांकि, एग्जिट पोल में कहा गया था कि भाजपा पहली बार केरल में खाता खोलने जा रही है, जो रुझानों में भी सही साबित हुआ।
इस राज्य में जीतकर भी निराशा हाथ लगी
वहीं एग्जिट पोल में यह भी अनुमान लगाया गया था कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए को फिर से एकतरफा जीत हासिल मिलेगी। यह अनुमान भी सटीक साबित हुए। रुझानों के मुताबिक, भाजपा के खाते में 17 सीटें और जेडीएस के खाते में दो सीटें गईं। इससे भाजपा जीत तो गई, लेकिन कहीं न कहीं पहले की तरह अपना जादू नहीं चला पाई। 2019 के चुनाव में 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि अब महज 19 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।
2019 का हाल
साल 2019 के चुनाव नतीजों की ही बात करें तो भाजपा इन 129 में से 29 सीटें ही जीत सकी थी। इसमें भी 25 सीटें कर्नाटक की थीं। यानि कर्नाटक की 28 सीटें निकाल दें तो भाजपा चार राज्यों की 101 सीटों में से महज चार सीटें ही जीत सकी थी और ये सभी सीटें तेलंगाना की थीं।
बड़े नेताओं पर दांव
भाजपा ने दक्षिण की मुश्किल पिच पर केंद्रीय मंत्रियों और बड़े नेताओं को उतारा। केरल की ही बात करें तो जिस राज्य में पार्टी कभी खाता नहीं खोल सकी, उस राज्य से दो केंद्रीय मंत्रियों को मैदान में उतारा। और रुझानों में इसका फायदा दिखा भी। केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर और वी मुरलीधरन के अलावा अभिनेता से नेता बने सुरेश गोपी को भी भाजपा ने केरल से लोकसभा चुनाव लड़ाया।
भाजपा का सपना फिर अधूरा रह गया
दक्षिण भारत के पांच बड़े राज्यों का एग्जिट पोल काफी हद तक हैरान करने वाला था। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये थी कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा के लिए जीतना बड़ी चुनौती रहा है। जबकि एग्जिट पोल में इसके उलट उम्मीद जताई गई थी। हालांकि रुझानों के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा को सबसे ज्यादा कहीं झटका लगा है तो तमिलनाडु में। यहां खाता खोलने का सपना भाजपा का एक बार फिर अधूरा रह गया। यहां डीएमके ने 22 सीटें अपने नाम करा ली हैं।
तेलंगाना में अभी भी टक्कर
अगर तेलंगाना की बात करें तो यहां अभी भी कड़ी टक्कर चल रही है। रुझानों में भाजपा और कांग्रेस के खाते में आठ-आठ सीटें गई हैं। जबकि एआईएमआईएम को एक सीट मिली है। हालांकि, 2019 की तुलना में यहां भाजपा का असर होता दिखाई दिया। 2019 के चुनाव में भाजपा को महज चार सीटें मिली थी।
फिर सपना रह गया अधूरा
इनके अलावा, आंध्र प्रदेश में भी भाजपा को जीत मिलने का अनुमान लगाया गया था। कहा जा रहा था कि दक्षिण का किला फतह करने का भाजपा का लक्ष्य पूरा हो सकता है। भाजपा ने जीत का गणित लगाते हुए इस बार अकेले मैदान में उतरने की बजाय गठबंधन पर फोकस किया था। आंध्र प्रदेश में भाजपा चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और पवन कल्याण की जनसेना से गठबंधन कर उतरी। रुझानों के अनुसार, गठबंधन की वजह से ही भाजपा आंध्र प्रदेश में जीत दर्ज कर सकी है। क्योंकि यहां भाजपा को तीन सीटें मिली हैं। जबकि टीडीपी को 16 और जेएनपी को दो सीटें मिली हैं। वहीं इस गठबंधन को टक्कर देने वाली वाईएसआरसीपी के खाते में चार सीटें गई हैं।