माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने बंगाल में कोलकाता दक्षिण से सायरा शाह हलीम को उम्मीदवार बनाया है। कभी वामपंथी दलों का गढ़ रहे बंगाल में अब सीपीआई-सीपीएम जैसे दल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस संघर्ष में वामपंथी दलों के लिए सायरा हलीम उम्मीद की किरण नजर आती हैं। 2022 में टीएमसी के विधायक सुब्रत मुखर्जी के निधन के बाद बालीगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में हलीम ने तृणमूल के उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो को कड़ी टक्कर दी थी। हलीम चुनाव हार तो गईं, मगर सुप्रियो की जीत से ज्यादा उनकी हार की चर्चा रही, क्योंकि लंबे अर्से बाद सीपीएम के किसी नेता को बंगाल में खुलकर लोगों का समर्थन मिला।
सायरा का मानना है कि लोग वामपंथ से नहीं, बल्कि पुराने चेहरे देखकर थक गए हैं। नए चेहरे देखना चाहते हैं। साथ ही उनका मानना है कि कट्टरपंथी विचारधारा वाले वामपंथी नेताओं को अब मैले-कुचैले कपड़े और घिसे-पिटे तरीके से जीवन जीना छोड़ना चाहिए। लेफ्ट के नेताओं को अपनी इमेज को राइट (सही) करना होगा। लोग अच्छे साफ-सुथरे कपड़े पहनने को गलत नहीं समझते। अपनी बात हमेशा चीख-चिल्लाकर रखना जरूरी नहीं होता, सौम्यता के साथ तार्किक बातों को लोग सुनते हैं।
44 वर्षीय सायरा मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की भतीजी हैं। उनके पिता जमीरुद्दीन शाह रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रह चुके हैं। उनके पति डॉ. फौद हलीम बंगाल के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हाशिम अब्दुल हलीम के बेटे हैं और सीपीएम के स्थापित नेता हैं।
पिता, पति के साये से अलग बनाई पहचान
टिकट मिलने से पहले ही शुरू किया प्रचार
सायरा शाह का घर दक्षिण कोलकाता में ही है। यहीं पति का क्लीनिक भी है। सीपीएम के स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच उनकी एक प्रेरक और जुझारू नेता की पहचान है, जो बिना बुलाए पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ खड़ी होती हैं। पार्टी की तरफ से अपने नाम की घोषणा होने से पहले ही उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया और घर-घर जाकर जनसंपर्क कर रही हैं। उनका मुकाबला तृणमूल की माला रॉय से है।
पॉडकास्टर को साक्षात्कार
डिजिटल-फर्स्ट की रणनीति
पॉलिटिक एडवाइजर के संस्थापक व आम आदमी पार्टी के आईटी सेल के पूर्व प्रमुख अंकित लाल ने कहा, कोविड के बाद सोशल मीडिया के प्रति दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है। राजनीतिक दल मतदाताओं से जुड़ने के लिए डिजिटल-फर्स्ट की रणनीति अपना रहे हैं।