मुस्लिम समुदाय को आरक्षण का लाभ देकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई है, लेकिन भाजपा ने विपक्ष की इसी ताकत को लोकसभा चुनाव में अपना हथियार बना लिया है। भाजपा नेता चुनावी सभाओं में मुसलमानों को दिये जाने वाले आरक्षण का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों को दिए जा रहे आरक्षण को ओबीसी समाज के हितों पर चोट करार दिया है। इससे चुनावी माहौल में गर्मी और ज्यादा बढ़ गई है।
कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन में शामिल विपक्ष दलों ने जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाकर ओबीसी और दलित समुदाय के मतदाताओं को साधने की योजना बनाई है, भाजपा के इस हमले से उन्हें नुकसान हो सकता है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल सहित जिन क्षेत्रों में चुनाव होने हैं, वहां मुसलमानों की आबादी बहुत अच्छी संख्या में रहती है। ऐसे में मुसलमानों को दिए जा रहे आरक्षण का मुद्दा चला, तो यह दूसरे वर्गों को एकजुट करने में मदद कर सकता है। यही कारण है कि भाजपा सोची-समझी रणनीति के साथ इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठा रही है। विशेषकर यूपी-बिहार-बंगाल में इसका सबसे ज्यादा असर हो सकता है, जहां की सीटें इस बार भाजपा और इंडिया गठबंधन दोनों के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
मुस्लिमों को मिल रहा ओबीसी आरक्षण
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर ने कहा है कि कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को ओबीसी समुदाय के आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कर्नाटक में सरकार ने ओबीसी समुदाय को दिए जाने वाले आरक्षण का विभाजन इस तरह से किया है कि उससे पूरे मुस्लिम समाज को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलने लगा है, जबकि ओबीसी समुदाय की ही मानी जाने वाली कई जातियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
हंसराज अहीर के अनुसार, कर्नाटक में ओबीसी समुदाय को 32 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। लेकिन इस आरक्षण को चार अलग-अलग उप श्रेणियों में बांट दिया गया है। श्रेणी ए, श्रेणी बी (ए), श्रेणी बी और तृतीय बी के रूप में ओबीसी आरक्षण की चार अलग श्रेणियां बना दी गई हैं। उनके अनुसार, श्रेणी ए में 95 जातियों को शामिल किया गया है। इनमें 17 जातियां मुसलमानों की शामिल हैं। द्वितीय ए श्रेणी में 103 ओबीसी जातियों को रखा गया है, लेकिन इसमें भी मुसलमानों की 19 जातियां शामिल हैं। आयोग के अनुसार, पूरे मुस्लिम समाज को कर्नाटक में चार फीसदी का आरक्षण दिया जा रहा है।
जातियों के पीछे धर्म को छिपाया: भाजपा
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण दिए जाने का प्रावधान नहीं है। लेकिन मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने दूसरा रास्ता खोज लिया है। अब वे मुसलमानों की पहचान भी जातिगत आधार पर करने लगी हैं। जबकि स्वयं मुसलमानों का दावा है कि इस्लाम में जातियों का कहीं कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन विपक्षी दलों ने मुसलमानों को उन जातियों का मान लिया, जिनमें वे इस्लाम स्वीकार करने के पहले हुआ करती थीं। यानी हिंदू रहते हुए जो लोग जिन जातियों के हुआ करते थे, उन्हें अब तक उन्हीं जातियों का मानकर मुसलमानों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति या परिवार ने अपना धर्म बदल लिया, तब उन्हें उनके पिछले धर्म की जातियों का सदस्य कैसे माना जा सकता है।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि इससे संबंधित एक वाद कलकत्ता उच्च न्यायालय में आया था। अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क पर आपत्ति जताते हुए यह पूछा कि यदि इस्लाम में शामिल होने से पूर्व ये सभी लोग हिंदू समुदाय के थे, तो राज्य सरकार बताए कि राज्य में इतने बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन कैसे हो गया। त्रिवेदी के अनुसार, अदालत के इस प्रश्न के बाद राज्य सरकार ने मौन साध लिया, लेकिन जातियों के पीछे छिपकर मुसलमानों को आरक्षण अब तक दिया जा रहा है।
कर्नाटक चुनाव में बनाया था मुद्दा
भाजपा ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय को दिये जाने वाले आरक्षण का मुद्दा उठाया था। पार्टी ने दावा किया था कि यदि वह विधानसभा चुनाव जीतती है, तो मुसलमान समुदाय को दिए जाने वाले चार फीसदी आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर देगी, इस आरक्षण को कर्नाटक मूल के दो समुदायों में दो-दो फीसदी बांट दिया जाएगा। भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया भी था, लेकिन भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से गुजरती भाजपा सरकार दोबारा सत्ता में आने में असफल रही।