Najafgarh Seat: दिल्ली के विधानसभा चुनावों में नजफगढ़ सीट भी चर्चित सीटों में एक है। यहां से दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री कैलाश गहलोत विधायक थे। पिछले साल ही उन्होंने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
दिल्ली चुनावों में कई चर्चित सीटें हैं, जिस सीट पर बड़े चेहरों की टक्कर देखने को मिलती है। ऐसी ही एक सीट नजफगढ़ सीट भी है। इस सीट से जीतकर आए आप के पूर्व विधायक कैलाश गहलोत दिल्ली सरकार में परिवहन एवं पर्यावरण मंत्री रहे थे, लेकिन उनके भाजपा में जाने के बाद से आप को इस सीट पर चेहरा ढूढने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। दो बार इस सीट से आप के कैलाश गहलोत विधायक रहे। यह सीट पश्चिमी दिल्ली लोकसभा सीट के अंदर आती है। इस सीट पर कुल 277322 मतदाता वोट डालने के लिए पात्र हैं। इनमें से 144948 पुरुष और 132362 महिलाएं हैं बाकि 12 अन्य मतदाता है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के इतिहास में नजफगढ़ में कब कौन जीता? कब कितने वोट पड़े? पिछले चुनाव में कैसे नतीजे रहे थे? इस बार कैसा मुकाबला हो सकता है? आइये जानते हैं…
दिल्ली को विधानसभा मिलने की ऐसी है कहानी
दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। 1952 पार्ट-सी राज्य के रूप में दिल्ली को एक विधानसभा दी गई। 1956 में उस विधानसभा को भंग कर दिया गया। 1966 में दिल्ली को एक महानगर परिषद दी गई। दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। दिल्ली राज्य विधानसभा 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत अस्तित्व में आई। 1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था, जिसके संबंध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्ति दी गई थी।
राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) की सिफारिशों के बाद दिल्ली 1 नवंबर 1956 से भाग-सी राज्य नहीं रही। दिल्ली विधानसभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रशासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बन गया। इसके बाद दिल्ली में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की मांग उठने लगी। फिर दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 के तहत महानगर परिषद बनाई गई। यह एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय था, जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और 5 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होते थे।
इसके बाद भी विधानसभा की मांग उठती रही। 24 दिसंबर 1987 को भारत सरकार ने सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति कहा गया) नियुक्त की। समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट पेश की और सिफारिश की कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना रहना चाहिए, लेकिन आम आदमी से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अच्छी शक्तियों के साथ एक विधानसभा दी जानी चाहिए। बालाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार, संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया, जिसने संविधान में नए अनुच्छेद 239AA और 239AB डाले, जो अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली के लिए एक विधानसभा की व्यवस्था करते हैं। लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं था। 1992 में परिसीमन के बाद 1993 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव बाद दिल्ली को एक निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री मिला।
नजफगढ़ के चुनावी इतिहास में कांग्रेस का जलवा
इस सीट का इतिहास बहुत पुराना है। यहां 1951 में यहां सबसे पहले चुनाव हुआ था। उस समय सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के अजीत सिंह ने भारतीय जनसंघ के किशन चंद को 3987 वोट से हरा दिया था।
1972 में यहां फिर चुनाव हुए थे जिसमें कांग्रेस के मुकाम सिंह ने निर्दलीय सूरज भान को केवल 52 वोट से हराया था।
1977 में यहां कांग्रेस ने फिर से जीत दर्ज कर ली थी। कांग्रेस के भरत सिंह ने जनता पार्टी के महिंदर सिंह को 16008 वोट से हरा दिया था।
1983 में चुनावों में फिर से कांग्रेस के भरत सिंह जीत मिली। कांग्रेस ने लोकदल के तारिफ सिंह को 27924 वोट से हरा दिया था।
1993: पहली बार नजफगढ़ में विधानसभा चुनाव
दिल्ली को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए। 1993 में इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार सूरज प्रसाद ने भाजपा के रण सिंह को 5379 वोट से हराया।
1998: कांग्रेस को मिली जीत
1998 में सीट पर फिर से कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के कंवल सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार जय किशन शर्मा को 1827 वोट से हराया।
2003: निर्दलीय उम्मीदवार की जीत
2003 में इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली। निर्दलीय चुनाव लड़ रहे रणबीर सिंह ने कांग्रेस के कंवल सिंह को 17090 वोट से हराया।
2008: कांग्रेस को भरत सिंह का टिकट काटना पड़ा महंगा
2008 के चुनाव में भरत सिंह को को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया था। भरत सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला लिया। भरत सिंह ने कांग्रेस के कंवल सिंह यादव को 11453 वोट से हराया।
2013: भाजपा की पहली जीत
दिल्ली की राजनीति के लिए साल 2013 एक अहम कड़ी साबित हुआ। इस चुनाव में मुकाबले में कांग्रेस-भाजपा के अलावा आम आदमी पार्टी भी थी। नजफगढ़ विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। इस सीट पर इंडियन नेशनल लोकदल और भाजपा के बीच मुकाबला हुआ। भाजपा ने इस चुनाव में पहली बार जीत दर्ज की थी। भाजपा के अजीत सिंह खरखरी ने लोकदल से चुनाव लड़ रहे भरत सिंह को 9768 वोट से हराया था।
2015: आप को मिली पहली जीत
2015 में फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव करवाने पड़े। 2014 में मात्र 49 दिन सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2014 में जब लोकपाल विधेयक पारित नहीं हो पाया तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में फिर से चुनाव कराए गए और केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
इस चुनाव में नजफगढ़ सीट पर भी आप ने जीत दर्ज की थी। आप के कैलाश गहलोत ने लोकदल के भरत सिंह को 1555 वोट से हरा दिया था। कैलाश गहलोत को 55598 और भरत सिंह को 54043 वोट मिले थे।
2020: आप के कैलाश गहलोत दूसरी जीत
2020 के विधानसभा चुनाव में आप आदमी पार्टी ने फिर जबरदस्त जनादेश हासिल किया। आप को 70 में से कुल 62 सीटों पर जीत मिली। नजफगढ़ सीट पर आप के कैलाश गहलोत ने फिर से जीत दर्ज की थी। कैलाश गहलोत ने भाजपा के अजीत सिंह खरखरी को 6,231 वोट से हराया था।
अबकी बार कैसे हैं समीकरण?
2025 के चुनावों में आप ने यहां से तरूण यादव को टिकट दिया है। तरूण यादव की पत्नी नजफगढ़ में निर्दलीय पार्षद हैं। कैलाश गहलोत के इस्तीफा देने के बाद वे आप में शामिल हो गए थे। भाजपा ने नीलम पहलवान और कांग्रेस ने सुषमा यादव को टिकट दिया है। भाजपा ने कांग्रेस दोनों ने सीट पर महिला उम्मीदवारों को उतारा है।