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Karol Bagh Seat: करोलबाग में भाजपा ने राष्ट्रीय महासचिव को उतार रोचक किया मुकाबला, ऐसा है इसका चुनावी इतिहास

Wed, 29 Jan 2025 08:01 PM IST
संध्या कुमारी इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला

सार

Karol Bagh Seat: 2025 के चुनावों के लिए मैदान सज चुका है। इसे लेकर सभी पार्टियां लगातार सीटों पर अपने ताकतवर उम्मीदवारों को उतारने में लगे हुए है। करोल बाग से भाजपा ने अपने बड़े नेता दुष्यंत कुमार गौतम को टिकट दिया है। आप ने यहां से मौजूदा विधायक को उतारा है। कौन इस सीट को अपने नाम करता है ये आने वाली 8 फरवरी को पता चलेगा। 

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दिल्ली चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में करोल बाग सीट भी शामिल है। इस सीट का चुनावी इतिहास भी काफी दिलचस्प है। ये नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अंदर आती है। यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। इस सीट पर इस बार कुल 1,87,915 मतदाता वोट डालने के लिए पात्र हैं। इनमें से 1,01,674 पुरुष और 86,231 महिलाएं हैं। 

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दिल्ली विधानसभा चुनाव के इतिहास में करोल बाग में कब कौन जीता? कब कितने वोट पड़े? पिछले चुनाव में कैसे नतीजे रहे थे? इस बार कैसा मुकाबला हो सकता है? आइये जानते हैं…

दिल्ली को विधानसभा मिलने की ऐसी है कहानी
दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। 1952 पार्ट-सी राज्य के रूप में दिल्ली को एक विधानसभा दी गई। 1956 में उस विधानसभा को भंग कर दिया गया। 1966 में दिल्ली को एक महानगर परिषद दी गई। 

दिल्ली राज्य विधानसभा 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत अस्तित्व में आई। 1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था, जिसके संबंध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्ति दी गई थी। 

राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) की सिफारिशों के बाद दिल्ली 1 नवंबर 1956 से भाग-सी राज्य नहीं रही। दिल्ली विधानसभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रशासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बन गया। दिल्ली में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की मांग उठने लगी। इसके बाद दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 के तहत महानगर परिषद बनाई गई। यह एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय था जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और 5 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होते थे।

इसके बाद भी विधानसभा की मांग उठती रही। 24 दिसंबर 1987 को भारत सरकार ने सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति कहा गया) नियुक्त की। समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट पेश की और सिफारिश की कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना रहना चाहिए, लेकिन आम आदमी से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अच्छी शक्तियों के साथ एक विधानसभा दी जानी चाहिए। बालाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार, संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया, जिसने संविधान में नए अनुच्छेद 239AA और 239AB डाले, जो अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली के लिए एक विधानसभा की व्यवस्था करते हैं। लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं था। 1992 में परिसीमन के बाद 1993 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव बाद दिल्ली को एक निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री मिला। 

1993: करोल बाग में भाजपा को मिली जीत
दिल्ली को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए। इस समय यहां से भाजपा एसपी रातावाल ने कांग्रेस की सुंदरवती नवल प्रभाकर को 11,389 वोट से हराया था। 

दिल्ली चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

1998: कांग्रेस ने भाजपा से छीनी सीट
1998 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला फिर से कांग्रेस और भाजपा के बीच में देखने को मिला। इन दो दलों के उम्मीदवारों के अलावा किसी भी उम्मीदवार को 600 वोट भी नहीं मिले। नतीजों की बात करें तो इस बार कांग्रेस 1993 में मिली हार का बदला ले लिया। इस चुनाव में कांग्रेस के मोती लाल बोकोलिया ने भाजपा के सुरेन्द्र पाल रातावाल को  2,312 वोट से हरा दिया था। 

 

2003: भाजपा ने फिर की वापसी
2003 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने करोलबाग सीट को वापसी की। भाजपा के सुरेंद्र पाल रातावाल ने कांग्रेस के दुर्गेश मोहनपुरिया को कांटे के मुकाबले में हरा दिया। सुरेंद्र पाल रातावाल की जीत महज 859 वोटों की रही। भाजपा उम्मीदवार को 21,812 वोट मिले। कांग्रेस के दुर्गेश मोहनपुरिया को 20,953 वोट से संतोष करना पड़ा। 

2008: लगातार दूसरी बार जीती भाजपा 
2008 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला देखने को मिला। हालांकि, लगातार दूसरी बार जीत भाजपा को ही मिली। भाजपा के सुरेंद्र पाल रातावाल ने कांग्रेस के मदन खोरवाल 3408 वोट से हरा दिया। 

2013: पहली बार चुनाव लड़ रही आप को मिली जीत 
दिल्ली की राजनीति के लिए साल 2013 एक अहम कड़ी साबित हुआ। इस चुनाव में मुकाबले में कांग्रेस-भाजपा के अलावा इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी भी थी। करोल बाग विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। यहां कांटे के मुकाबले में जीत आम आदमी पार्टी को मिली। आप के विशेष रवि ने 2008 में यहां से जीते भाजपा के सुरेंद्र  पाल रातावाल को महज 1750 वोट से हरा दिया। कांग्रेस के मदन खोरवाल तीसरे स्थान पर खिसक गए। 

दिल्ली चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

2015: आप ने दर्ज की लगातार दूसरी जीत
2015 में फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने पड़े। 2014 में मात्र 49 दिन सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2014 में जब लोकपाल विधेयक पारित नहीं हो पाया तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में फिर से चुनाव कराए गए और केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। 

करोल बाग सीट पर आप ने अपनी जीत को बनाए रखा। यहां से एक बार फिर आप के विशेष रवि को जीत मिली। आप के विशेष रवि ने भाजपा के योगेन्द्र चंदोलिया को 32,880 वोट से हरा दिया। आप उम्मीदवार को 67,429 और भाजपा के उम्मीदवार को 34,549 वोट मिले थे। कांग्रेस के मदन खोरवाल इस बार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। 

2020: आप ने लगाई जीत की हैट्रिक
2020 के विधानसभा चुनाव में आदमी पार्टी ने फिर जबरदस्त जनादेश हासिल किया। आप को 70 में से कुल 62 सीटों पर जीत मिली। करोल बाग की बात करें तो इस सीट पर फिर से आप के मौजूदा विधायक विशेष रवि ने जीत का परचम लहराया था। इसका साथ ही विशेष रवि ने करोलबाग सीट पर अपनी और पार्टी की जीत की हैट्रिक लगाई। आप उम्मीदवार ने भाजपा के योगेन्द्र चांदोलिया को 31,760 वोट से हरा दिया था। विशेष रवि को 67,494 और योगेन्द्र चांदोलिया को 35,734 वोट मिले। 

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अबकी बार कैसे हैं समीकरण? 
इस चुनाव के लिए भी आप ने मौजूदा विधायक विशेष रवि को ही मैदान में उतारा है। भाजपा ने पूर्व राज्यसभा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यन्त कुमार गौतम को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने इस सीट से राहुल धनक को टिकट दिया है।  करोलबाग सीट पर कुल छह उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। नतीजा किसके पक्ष में रहेगा इसका पता 8 फरवरी को चलेगा।  



 
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