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यूपीएससी की शताब्दी: पीएम मोदी बोले- सिविल सेवा में भर्ती के लिए सिर्फ ज्ञान नहीं, सेवा भावना भी जरूरी

Thu, 01 Oct 2026 12:10 PM IST
शिवम तिवारी एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

यूपीएससी ने 100 साल पूरे कर लिए हैं। शताब्दी समारोह में पीएम मोदी ने परीक्षा, सिविल सेवा भर्ती, सरदार पटेल और युवाओं की भूमिका पर बात की।
 
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यूपीएससी के 100 साल में क्या बदला? - फोटो : @BJPLive
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विस्तार
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संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह में शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान यूपीएससी के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया गया। इसके साथ ही एक विशेष पुस्तक का भी विमोचन किया गया। यह दो दिवसीय कार्यक्रम यूपीएससी की ऐतिहासिक यात्रा के साथ देश की सार्वजनिक सेवा व्यवस्था में इसके योगदान को समझने का अवसर भी है।
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इस दो दिवसीय शताब्दी समारोह में देशभर के राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य शामिल हो रहे हैं। केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और यूपीएससी से जुड़े अधिकारी भी कार्यक्रम का हिस्सा हैं। पहले इसे लोक सेवा आयोग के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी के रूप में जाना गया। आज यह देश में विभिन्न केंद्रीय सेवाओं के लिए योग्य उम्मीदवारों के चयन की प्रमुख संस्था है।

सरदार पटेल की भूमिका क्यों अहम रही?

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सरदार वल्लभ भाई पटेल को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि आजादी के बाद उनके सामने केवल देश को स्वतंत्र बनाए रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि राष्ट्र को चलाने और उसका पुनर्निर्माण करने की भी जिम्मेदारी थी। राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए जिस कौशल और प्रशासनिक क्षमता की जरूरत थी, उसके निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्होंने यूपीएससी जैसी संस्था को स्वतंत्र भारत के प्रमुख स्तंभों में शामिल करने और इसे मजबूत बनाने पर जोर दिया।

सुभाष चंद्र बोस का जिक्र क्यों हुआ?

प्रधानमंत्री ने यूपीएससी की गैलरी का उल्लेख करते हुए सुभाष चंद्र बोस की परीक्षा का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1920 में सुभाष चंद्र बोस भी उस समय की सिविल सेवा चयन प्रक्रिया से गुजरे थे। खास बात यह थी कि अंग्रेजी शासन के दौर में भी परीक्षा में संस्कृत का पेपर हुआ करता था और सुभाष चंद्र बोस ने संस्कृत में परीक्षा दी थी। यह उदाहरण बताता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था समय के साथ लगातार बदलती रही है।

भर्ती में केवल ज्ञान क्यों पर्याप्त नहीं?

प्रधानमंत्री ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में ऐसे युवाओं को लाना जरूरी है, जो केवल सार्वजनिक पद से नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा से आकर्षित हों। इसी संदर्भ में भर्ती परीक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि परीक्षा केवल यह न परखे कि उम्मीदवार कितना जानता है, बल्कि यह भी समझने की कोशिश हो कि वह सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है। शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि विषय ज्ञान के साथ सेवा की भावना और जिम्मेदारी की समझ भी जरूरी है।

यूपीएससी के उम्मीदवारों से क्या उम्मीद है?

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जिन युवाओं का चयन सिविल सेवाओं के लिए हो रहा है, वे विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और भविष्य में विकसित भारत के लाभार्थी भी होंगे। ऐसे में सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए परीक्षा केवल नौकरी हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज में जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी है।

कौन से दो सिद्धांत याद रखने होंगे?

प्रधानमंत्री ने सिविल सेवाओं के संदर्भ में दो सिद्धांतों पर जोर दिया- नेशन फर्स्ट यानी राष्ट्र प्रथम और सिटिजन फर्स्ट यानी नागरिक प्रथम। उन्होंने कहा कि देश को जिस तरह के शासन की जरूरत है, उसके लिए यूपीएससी महत्वपूर्ण स्रोत है। 100 साल की इस यात्रा में पीढ़ियां बदलीं, सरकारें बदलीं, तकनीक बदली और सिलेबस भी बदले, लेकिन यूपीएससी पर लोगों का भरोसा बना रहा। शताब्दी समारोह इसी विरासत और हर साल सिविल सेवा का सपना देखने वाले लाखों युवाओं की आकांक्षाओं का भी उत्सव है।
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