संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी के चेयरमैन अजय कुमार ने परीक्षा सुधारों को लेकर अहम बात कही है। उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वे पहले से तैयार या कोचिंग में सिखाए गए मॉडल उत्तरों को कितनी अच्छी तरह दोहरा सकते हैं। इसके बजाय उनकी तर्क क्षमता, सहज सोच और अस्पष्ट परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता को परखना जरूरी है। अजय कुमार ने ये बातें नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहीं।
अजय कुमार ने आयोग की आगे की यात्रा के लिए विश्वास, पारदर्शिता और तकनीक को तीन प्रमुख मार्गदर्शक सिद्धांत बताया। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ संस्थानों को खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालना चाहिए, लेकिन ऐसा करते हुए उन मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखना जरूरी है जो उनकी संवैधानिक भूमिका का आधार हैं। उन्होंने कहा कि तकनीक और परीक्षा के तरीके समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन योग्यता, निष्पक्षता और समान अवसर जैसे संवैधानिक सिद्धांत हमेशा महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
उम्मीदवारों में किन क्षमताओं को परखा जाएगा?
परीक्षा सुधारों पर जोर देते हुए यूपीएससी चेयरमैन ने कहा कि उम्मीदवारों के मूल्यांकन में तर्क करने की क्षमता, परिस्थितियों के अनुसार तुरंत सोचने की क्षमता और अनिश्चित स्थिति में सही निर्णय लेने की योग्यता को महत्व दिया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य ऐसे उम्मीदवारों की पहचान करना है जो केवल तैयार उत्तर लिखने के बजाय वास्तविक परिस्थितियों में सोच और निर्णय ले सकें।
परीक्षा में तकनीक का इस्तेमाल कैसे बढ़ेगा?
अजय कुमार ने परीक्षा प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि डिजिटल ई-एडमिट कार्ड और फेस ऑथेंटिकेशन जैसे उपाय परीक्षा की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं।
यूपीएससी ने बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में अपने 100 साल पूरे होने के अवसर पर दो दिवसीय शताब्दी समारोह ‘मंथन’ की शुरुआत की। इसमें वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों ने सिविल सेवाओं की बदलती भूमिका, लोक प्रशासन में नए प्रयोग और सार्वजनिक सेवा से जुड़े संस्थागत मूल्यों पर चर्चा की।
हर साल कितनी भर्तियां करता है यूपीएससी?
अजय कुमार ने आयोग के काम के व्यापक दायरे की जानकारी देते हुए बताया कि यूपीएससी हर साल करीब 250 अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं आयोजित करता है। इनमें इंजीनियरिंग, मेडिकल, विज्ञान, अर्थशास्त्र और रक्षा सहित कई क्षेत्रों की भर्तियां शामिल हैं।
आयोग हर साल सिविल सेवा परीक्षा भी आयोजित करता है। इसके जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय विदेश सेवा (IFS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) सहित कई सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है।
परीक्षा कैलेंडर कितने पहले तैयार होता है?
यूपीएससी की परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया के लिए व्यापक स्तर पर योजना बनाई जाती है। अजय कुमार के मुताबिक आयोग का परीक्षा कैलेंडर करीब 18 महीने पहले तैयार किया जाता है। इससे भर्ती प्रक्रियाओं के संचालन के लिए जरूरी तैयारी और योजना का अंदाजा लगाया जा सकता है।
‘विकसित भारत’ में सिविल सेवा की भूमिका क्या होगी?
शताब्दी समारोह के पहले सत्र का विषय ‘विकसित भारत में सिविल सेवाओं की भूमिका’ था। इसकी अध्यक्षता यूपीएससी की सदस्य सुमन शर्मा ने की। सत्र में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, राज्यसभा सांसद और पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला तथा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत शामिल हुए।
सुमन शर्मा ने परिणाम आधारित प्रशासन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिविल सेवक नीतियों को जमीन पर वास्तविक परिणामों में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रशासन को केवल खर्च के आधार पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।
सिविल सेवा में युवाओं और छोटे शहरों की भागीदारी क्यों जरूरी है?
हर्षवर्धन श्रृंगला ने टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा आकांक्षी जिलों से भर्ती बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने सार्वजनिक सेवा में अधिक युवाओं को शामिल करने पर भी जोर दिया। उन्होंने अंत्योदय और निष्काम कर्म के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक सेवकों की जिम्मेदारी समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने की है।
लोक प्रशासन में जवाबदेही कैसे बढ़ेगी?
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत ने कहा कि सुधारों का उद्देश्य जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं को लागू करने वाली प्रशासनिक मशीनरी को सशक्त बनाना होना चाहिए। उन्होंने अधिकार आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर जवाबदेही पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई और प्रशासकों को वास्तविक अर्थों में ‘सेवक’ के रूप में काम करने पर जोर दिया।
AI और डेटा से प्रशासन कैसे बदलेगा?
दूसरे सत्र का विषय ‘लोक सेवा में नवाचार’ था। इसकी अध्यक्षता यूपीएससी सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (सेवानिवृत्त) ने की। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 शक्तिकांत दास ने मुख्य वक्तव्य दिया।
कार्मिक मंत्रालय के बयान के अनुसार, चर्चा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल आर्किटेक्चर के इस्तेमाल की संभावनाओं पर भी बात हुई। इन तकनीकों के जरिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता कम करने और सेवाओं की डिलीवरी को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया।
यूपीएससी की तकनीकी यात्रा कब शुरू हुई थी?
यूपीएससी की तकनीकी यात्रा कई दशकों पुरानी है। आयोग में कंप्यूटर का इस्तेमाल 1978 में शुरू हुआ था। इसके बाद परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में लगातार तकनीकी बदलाव किए गए। हाल के सुधारों में 2025 में यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर, रैंडमाइज्ड इंटरव्यू बोर्ड, 30-चैनल IP कॉल सेंटर वाला कैंडिडेट हेल्पडेस्क और परीक्षा केंद्रों का विस्तार शामिल है।
यूपीएससी के 100 साल पूरे होने का क्या महत्व है?
यूपीएससी की संस्थागत यात्रा की शुरुआत 1 अक्टूबर 1926 को हुई थी। उस समय भारत में पहला पब्लिक सर्विस कमीशन एक सलाहकार निकाय के रूप में गठित किया गया था। समय के साथ यह संस्था विकसित होकर एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय बनी। शताब्दी समारोह इसी लंबी संस्थागत यात्रा, बदलती भर्ती प्रक्रियाओं और भविष्य की लोक सेवा व्यवस्था पर मंथन का अवसर बन रहा है।