शीर्ष अदालत के न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वह साईंबाबा की अपील और अन्य आरोपियों की अपील उसी पीठ के समक्ष न रखें, जिसने उन्हें आरोपमुक्त किया था और मामले की सुनवाई किसी अन्य पीठ द्वारा की जाए।
इसमें कहा गया है कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मंजूरी सहित कानून का सवाल उच्च न्यायालय द्वारा फैसले के लिए खुला रहेगा। शीर्ष अदालत ने 15 अक्तूबर को इस मामले में साईंबाबा और अन्य को बरी करने के बंबई उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी। अधिवक्ता अभिकल्प प्रताप सिंह महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए और वरिष्ठ अधिवक्ता आर बसंत ने शीर्ष अदालत में मामले में साईंबाबा का पक्ष रखा।
2014 में उनकी गिरफ्तारी के आठ साल से अधिक समय बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले साल 14 अक्तूबर को साईंबाबा को बरी कर दिया और जेल से उनकी रिहाई का आदेश दिया। उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने यूएपीए और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सजा सुनाने के ट्रायल कोर्ट के 2017 के आदेश को चुनौती देने वाली साईंबाबा की अपील को स्वीकार कर दिया।
साईंबाबा के अलावा, बॉम्बे हाई कोर्ट ने महेश करीमन तिर्की, पांडु पोरा नरोटे (दोनों किसान), हेम केशवदत्त मिश्रा (छात्र) और प्रशांत सांगलीकर (पत्रकार), जिन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, और विजय तिर्की (मजदूर) को बरी कर दिया था। 10 साल जेल की सजा सुनाई थी। अपील की सुनवाई के दौरान नरोटे की मौत हो गई।