बीसीआई को कानूनी शिक्षा में दखल देने से रोका
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा, "बीसीआई का काम कानूनी शिक्षा के मामले में हस्तक्षेप करना नहीं है। इसे कानूनविदों और विधि शिक्षकों पर छोड़ देना चाहिए। कृपया इस देश की कानूनी शिक्षा पर दया करें।"
बीसीआई के वकील ने तर्क दिया कि असल मुद्दा यह है कि दोषियों को वर्चुअल माध्यम से कक्षाएं लेने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं, क्योंकि यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के विपरीत है।
प्रगतिशील आदेश को क्यों चुनौती दे रहा है बीसीआई?
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सवाल उठाया कि अगर उच्च अदालतें इन दोषियों को बाद में बरी कर देती हैं तो फिर क्या होगा? अदालत ने कहा, "BCI को इस तरह के प्रगतिशील आदेश का विरोध नहीं करना चाहिए था, बल्कि इसे समर्थन देना चाहिए था, न कि रूढ़िवादी और पारंपरिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।"
बीसीआई के वकील ने कहा कि वे केरल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल इस मामले में कानून से जुड़े व्यापक मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई की याचिका को खारिज करते हुए केरल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि इस विशेष मामले को ध्यान में रखते हुए दोषियों को ऑनलाइन मोड में एलएलबी की पढ़ाई करने की अनुमति दी जाती है।