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SC: सीबीएसई की तीन भाषा नीति में सुप्रीम कोर्ट को क्या खटका? 'Native' शब्द के इस्तेमाल को लेकर कही ये बात

Thu, 20 Aug 2026 03:52 PM IST
Akash Kumar एएनआई, नई दिल्ली

सार

CBSE Three-Language Policy: सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ‘नेटिव’ शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। अदालत ने अंग्रेजी की स्थिति, भारतीय भाषाओं के शिक्षकों और स्कूलों की तैयारी पर भी सवाल किए।
 
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Supreme Court On CBSE Three Language Policy - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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CBSE Three-Language Policy: केंद्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने नीति में इस्तेमाल किए गए ‘नेटिव’ यानी मूल भाषा शब्द पर सवाल उठाया।

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जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने "नेटिव" शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह औपनिवेशिक (colonial) दौर से आया है। उन्होंने सवाल किया कि भारत में अंग्रेजी को किस हद तक गैर-स्वदेशी भाषा माना जा सकता है।

जस्टिस बागची ने कहा कि उन्हें ‘नेटिव’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति है और इसकी जगह ‘इंडिजिनस’ यानी स्वदेशी शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तैयार करने वालों को ‘नेटिव’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर सावधान होना चाहिए था।

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क्या अंग्रेजी को स्वदेशी या गैर-स्वदेशी भाषा माना जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे इस सवाल पर भी विचार करना होगा कि भारत में अंग्रेजी को स्वदेशी या गैर-स्वदेशी भाषा माना जा सकता है या नहीं।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस सवाल को संवैधानिक दृष्टि से देखना होगा। यानी केवल भाषा के वर्गीकरण की बात नहीं है, बल्कि यह भी जांचना होगा कि इस तरह का वर्गीकरण संविधान के अनुरूप है या नहीं।

कक्षा 5 से 9 तक तीन भाषाएं पढ़ने का क्या नियम है?

केंद्र की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत लागू तीन-भाषा व्यवस्था को लेकर याचिकाएं दायर की गई हैं। इसके तहत कक्षा 5 से 9 तक के विद्यार्थियों को दो भारतीय ‘नेटिव’ भाषाओं के साथ एक तीसरी भाषा पढ़नी होगी।

याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था के लागू होने को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सभी स्कूलों में निर्धारित भाषाओं को पढ़ाने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इनमें खास तौर पर शामिल हैं:
  • पर्याप्त पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता
  • योग्य भाषा शिक्षकों की कमी
  • अलग-अलग भाषाओं को पढ़ाने के लिए जरूरी संसाधन
  • नीति लागू करने के लिए पर्याप्त प्रशासनिक व्यवस्था

क्या स्कूलों के पास पर्याप्त शिक्षक और संसाधन हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ भाषा के मुद्दे तक खुद को सीमित नहीं रखा। अदालत ने यह भी सवाल किया कि क्या स्कूलों के पास इस नीति को लागू करने के लिए पर्याप्त प्रशासनिक और शिक्षण ढांचा मौजूद है।

जस्टिस जॉयमल्या बागची ने केंद्र से यह भी पूछा कि क्या स्कूलों में संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं को पढ़ाने के लिए पर्याप्त योग्य शिक्षक हैं। उन्होंने सवाल किया, “हमारे स्कूलों में कितने संस्कृत शिक्षक बीएड योग्य हैं?”

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करना और उसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराना दो अलग-अलग बातें हैं।
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सीजेआई ने नीति में बदलाव की ओर क्या संकेत दिया?

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाई गई चिंताओं और सवालों पर ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि इन संदेहों पर दोबारा विचार किया जा सकता है और नीति को अधिक व्यवस्थित बनाया जा सकता है।

सीजेआई ने केंद्र की ओर संकेत करते हुए कहा कि संबंधित संस्था एक विशेषज्ञ निकाय है और उसे यह देखना चाहिए कि नीति को कैसे बेहतर तरीके से लागू और व्यवस्थित किया जा सकता है।

इससे संकेत मिलता है कि अदालत के सामने केवल ‘नेटिव’ शब्द का सवाल नहीं है। तीन-भाषा नीति को जमीन पर लागू करने की व्यावहारिक क्षमता भी सुनवाई का एक अहम हिस्सा बन गई है।
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