पीठ ने, जिसमें न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे, कहा कि राज्यपाल किसी राज्य में विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति होता है और कुलाधिपति के रूप में सभी विश्वविद्यालय मामलों पर निर्णय लेने में मंत्रिपरिषद से स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हालांकि प्रतिवादी संख्या 4 (रवींद्रन) को कुलपति के पद पर फिर से नियुक्त करने की अधिसूचना कुलाधिपति (राज्यपाल) द्वारा जारी की गई थी, फिर भी पुनर्नियुक्ति का निर्णय बाहरी विचारों से प्रभावित था या कहें तो दूसरे शब्दों में, राज्य सरकार का अनुचित हस्तक्षेप इसमें शामिल था।
बता दें कि शीर्ष अदालत ने कहा कि 23 फरवरी, 2022 को उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और पारित आदेश को रद्द कर दिया गया है और इसके परिणामस्वरूप, 23 नवंबर, 2021 की अधिसूचना, प्रतिवादी संख्या 4 (रवींद्रन) को कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में फिर से नियुक्त किया जाता है। फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि शीर्ष अदालत ने कई सवालों का समाधान किया, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या कार्यकाल तय होने पर पुनर्नियुक्ति की अनुमति है।