तीन दशक पहले इंद्रावती ने अपनी नौकरी के पहले दिन सोचा था, ‘ये काम मुझसे नहीं होगा। चिट्ठियों का भारी बैग कौन उठाए? अनजान घरों में जाना शर्म की बात है या नहीं?’ लेकिन जिद थी, वह अपने मोर्चे पर डटी रहीं। यह उस दौर की बात है, जब घर डाकिये की राह देखा करते थे। उस वक्त इंद्रावती दिल्ली में डाकिये के रूप में नियुक्त हुई और पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में तीन दशक से ज्यादा समय तक डटी रहीं। साल 1982 में इंद्रावती महिला डाकिया के तौर पर नियुक्त हुई थीं। तब औरतों के लिए इस क्षेत्र के बारे में कोई सोचता भी नहीं था।
इंद्रावती दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित स्पीड पोस्ट डिपार्टमेंट में थीं और आसपास के 6-7 किलोमीटर के क्षेत्र में पैदल चिट्ठियां बांटा करती थीं। अपने शुरुआती दिनों को याद करती हुई वह कहती हैं, ’जब मैं चिट्ठियां देने जाती थी, तो कई लोग मानते ही नहीं थे कि मैं डाकिया हूं। फिर उन्हें कार्ड दिखाना पड़ता था। इंद्रावती से पहले भी डाक विभाग में महिलाएं थीं, लेकिन चिट्ठी बांटने के काम में नहीं। अब इंद्रावती रिटायर हो चुकीं हैं, लेकिन उनके साहस ने कई महिलाओं को रास्ता दिखाया।