ऐसे में मैंने संकल्प लिया कि इस स्थिति को समय रहते सुधारना होगा, क्योंकि अभी नहीं तो कभी नहीं। इस बात को समझने के बाद मैं मुंबई से वापस गांव चला आया। यहां आकर सबसे पहले मैंने गांव को खुले में शौचमुक्त करने का प्रयास शुरू किया। और शौचालय निर्माण के साथ जल संरक्षण के विकल्प भी खोजने लगा। मैंने देखा कि यहां समस्याएं कई थीं और बिना किसी सरकारी मदद के उन्हें हल करना मुश्किल था। इसलिए मैंने सरपंच का चुनाव लड़ने का विचार किया।
सुखद बात यह रही कि गांव वालों ने मेरा साथ दिया। 32 वर्ष की उम्र में मैं यगांव का सरपंच बन गया। सरपंच बनने के बाद मैंने पहला काम यह किया कि गांव के सभी लोगों तक शौचालय की उपलब्धता करवाई। इसके बाद मैंने गांव में पानी की समस्या को हल करने की दिशा में प्रयास करने शुरू कर दिए। इस बीच, मैंने आर्ट ऑफ लिविंग्स से सहायता मांगी। इस पर उन्होंने मुझे नदी कायाकल्प परियोजना के सहयोग से पानी की कमी के मुद्दे का समाधान बताया। फिर गांव के सभी लोगों के साथ मिलकर मैंने स्टॉप द वाटर, सेव द वाटर के नाम से एक अभियान शुरू किया।
इसके तहत मैंने विशेषज्ञों को बुलाकर गांव वालों से रूबरू कराया। विशेषज्ञों ने बताया कि किस तरह से लिफ्ट सिंचाई, बोल्डर बांधों और इस तरह की अन्य संरचनाओं का निर्माण उन्हें पानी के संरक्षण में मदद कर सकता है और बिजली के पंपों की मदद से व अन्य स्रोतों से पानी सीधे उनके खेतों तक पहुंचाया जा सकता है। मैंने गांव के एक-एक व्यक्ति से इस बारे में बात की, उन्हें जल के संरक्षण का तरीका बताया, साथ , सामुदायिक कार्यशालाओं का आयोजन किया।
इसमें महाराष्ट्र सरकार की तरफ से हमें आर्थिक सहायता मिली। हमारी कोशिशों के चलते अब बारिश के मौसम में गांव के तालाब को भरा जा चुका है। गांव के कुएं
को भी सुधारा जा चुका है, जिससे पीने का पानी आसानी से मिल रहा है। मुझे लगता है कि यह सिर्फ शुरुआत है और चीजें अकेले कुछ वर्षों में नहीं बदलेगी। इसमें समय लगेगा और हमें इसके लिए काम करना होगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।