छोटा बच्चा समझ के हमको ना आजमाना रे....ये गाना शायद ऐसे ही करामाती बच्चों को देखकर बनाया गया होगा। खेलने कूदने की उम्र में इन बच्चों ने देश दुनिया में अपने कारनामों से झंडे गाड़ दिए। इन बच्चों के नाम कुछ भी हो सकते हैं, इनका वर्ग, जाति और उम्र भी अलग अलग हो सकती है। लेकिन इनमें एक समान बात है कि सभी बच्चे भारतीय हैं और इन्होंने अपने कारनामों से भारत देश का नाम रौशन किया है।
विज्ञापन
इनमें कुछ बच्चे तो ऐसे विरले निकले जिन्होंने खुद गरीब और वंचित होते हुए कमाल की सोच और हौंसला दिखाया और दूसरे वंचितों के लिए मिसाल बन गए। कुछ बच्चों ने विदेशी धरती पर नए इनोवेशन किए और देश का नाम ऊंचा किया।
आइए जानते हैं कि साल 2014 में ऐसे बच्चों के बारे में जिन्होंने अपने कारनामों से बड़ों बड़ों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
नेत्रहीनों को दे दी अनुपम सौगात
केलीफोर्निया में आठवीं क्लास के भारतीय मूल के छात्र शुभम बनर्जी ने नेत्रहीनों के लिए बेहद किफायती ब्रेल प्रिंटर बनाया है। शुभम के इस अविष्कार को बाजार में लाने का जिम्मा उठाते हुए 'इंटेल कैपिटल' ने इस प्रोजेक्ट में इन्वेस्टमेंट की घोषणा की है।
शुभम ने खिलौने बनाने वाले लेगो ब्रिक्स की मदद से नेत्रहीनों के लिए बेहद सस्ता ब्रेल प्रिंटर ईजाद किया है। लेगो ब्रिक्स की मदद से बने इस प्रिंटर का नाम है 'ब्रेगो'। इंटेल कैपिटल का कहना है कि शुभम के इस प्रोजेक्ट को बतौर टेक्नोलॉजी वित्तीय मदद देगी और 'ब्रेगो लैब' बनाने में वित्तीय मदद करेगी।
शुभम के इस प्रोजेक्ट को दुनिया भर के नेत्रहीनों के लिए खास सौगात माना जा रहा है। शुभम अमेरिका के व्हाइट हाउस में इस प्रोजेक्ट को प्रदर्शित कर चुका है। खास बात ये है कि अमेरिका में जहां साधारण ब्रेल प्रिंटर 2 हजार डॉलर में बिकता है, शुभम का प्रिंटर महज तीन सौ डॉलर में मिल जाएगा।
शुभम की कामयाबी की पूरी स्टोरी यहां पढ़ें http://www.amarujala.com/feature/education/success-stories/13-year-old-creator-of-lego-braille-printer-is-youngest-ever-entrepreneur-hindi-news-vs/?page=0
गरीब बच्चों का बैंक बना डाला
बैंक तो अमीरों के होते हैं। गरीबों के पास पैसा कहां जो अकाउंट खोल सकें। लेकिन बाराबंकी से भागकर दिल्ली पहुंचे सोनू यादव नाम के बच्चे ने गरीब बच्चों का बैंक बनाकर इस अवधारणा को गलत साबित किया है। सोनू यादव कुछ बनने के लिए घर से भागकर दिल्ली पहुंचा था लेकिन यहां हालातों ने दिन में तारे दिखा दिए। पेट भरने के लिए सोनू सड़कों पर कूड़ा बीनने लगा। उसने कूड़ा बीनने वाले, भीख मांगने वाले और मजदूरी करने वाले बच्चों के साथ मिलकर चिल्ड्रेन डेवलपमेंट खजाना बना दिया। अब इस बैंक में गरीब और बेसहारा बच्चों को 30 लाख रुपए जमा हो चुके हैं।
सोनू की मदद करने के लिए दिल्ली का ही एक एनजीओ सामने आया और उसने इस बैंक की पहुंच दूसरे शहरों के गरीब बच्चों तक भी पहुंचाई। इसी का परिणाम है कि देश विदेश के 13 हजार बच्चे इस बैंक से जुड़ चुके हैं।
सोनू की कामयाबी की कहानी यहां पढ़ें http://www.amarujala.com/news/education/success-stories/begger-children-make-bank-hindi-news-vs/
इस बच्ची ने जागृत कर ली अपनी इंद्रियां!
वो उम्र जब बच्चे खुली आंखों से भी अटक अटक कर पड़ते हैं, नौ साल की जिया बंद आंखों से सब कुछ पढ़ लेती हैं। जिया आंखों पर पट्टी बांधकर फटाफट किताब या मोबाइल पर एसएमएस को पढ़ सकती है। आंखें बंद कर बोर्ड पर लिखे अंकों का जोड़ और इंसान को सूंघ कर उसे बंद आंखों से ढूंढने की कला भी इस बच्ची की खूबी है।
अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के चलते जिया को गूगल गर्ल और वंडर गर्ल कहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि इतनी छोटी सी उम्र में ही जिया ने पांचों इंद्रियों को जागृत करने में सफलता हासिल की है। जिया के स्कूल की प्रिंसीपल का कहना है कि इस छोटी सी उम्र में जिया की स्मरण शक्ति गजब की है। उसके लिए पीरियॉडिक टेबल और 300 साल के कैलेंडर में तारीख बताना चुटकी का खेल है।
जिया की सभी खासियतें जानने के लिए ये खबर पढ़ें http://www.amarujala.com/news/education/success-stories/after-googel-boy-there-is-google-girl-hindi-news-vs/
दुनिया का सबसे कम उम्र माइक्रोसॉफ्ट इंजीनियर
आम तौर पर पांच साल की उम्र में बच्चे माइक्रोसॉफ्ट का मतलब तक नहीं जानते लेकिन अयान कुरैशी नाम का ये बच्चा पांच साल की उम्र में माइक्रोसॉफ्ट स्पेशलिस्ट बन चुका है। माइक्रोसाफ्ट की तकनीक आधारित परीक्षा को पास कर माइक्रोसाफ्ट सर्टीफाइड प्रोफेशनल का तमगा पाने वाला अयान दुनिया का सबसे छोटा माइक्रोसॉफ्ट इंजीनियर कहला रहा है।
एक आईटी कंसलटेंट के बेटे अयान ने अपने घर में ही खुद अपने हाथों से कंप्यूटर नेटवर्क विकसित किया है। अयान के पिता बताते हैं कि तीन साल की उम्र से ही अयान कंप्यूटर पर काम कर रहा है। वो अपने पिता के पुराने कंप्यूटर पर काम करता रहा और कुछ ही महीनों में कंप्यूटर की बारीकियों को सीख गया।
ऐसे में जब बड़े बड़े युवा तक माइक्रोसॉफ्ट के टेस्ट की भाषा नहीं समझ पाते अयान ने इस टेस्ट को पास करके ये साबित किया है कि बच्चे किसी से कम नहीं।
अयान की कामयाबी की दास्तान पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें http://www.amarujala.com/news/samachar/national/five-years-kid-passes-microsoft-exam-hindi-news/
ग्रंथ ठक्कर का दिमाग है या कैलकुलेटर
गणित अच्छे अच्छों को समझ नहीं आता। गुजरात के 13 साल के ग्रंथ ठक्कर ने वर्ल्ड मेंटल अरिथमैटिक चैंपियनशिप जीतकर भारत का नाम गणित के क्षेत्र में दुनिया में रोशन कर दिया है।
हर दो साल में आयोजित होने वाली इस विश्वस्तरीय प्रतियोगिता में गणित विशेषज्ञ भी चकरा जाते हैं। वहीं 13 साल के ग्रंथ ने बिना कोई गलती किए बेहद कम वक्त के भीतर ही मैथेमैटिकल प्रॉबलम को हल करके करके प्रतियोगिता जीत ली। इस प्रतियोगिता में प्रतिभागी कैलकुलेटर का इस्तेमाल नहीं कर सकते। रफ कार्य करने के लिए पेपर औऱ पेंसिल भी सीमित मात्रा में थे। यह प्रतियोगिता हर दो साल में आयोजित की जाती है। इसमें 18 देशों के चालीस प्रतिभागी भाग लेते हैं।
ग्रंथ इससे पहले तुर्की के अंतालया शहर में हुए मैथ ओलिंपियाड में भी स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। उस प्रतियोगिता में दुनिया के सबसे तेज नंबर गेम 'फ्लैश अंजान' में ग्रंथ ने जूनियर कैटेगरी में स्वर्ण और सीनियर कैटेगरी में रजत पदक जीता था। गणित में उस्ताद होने के बावजूद ग्रंथ गणित में करियर नहीं बनाना चाहता। ग्रंथ की इच्छा है कि वो अंतरिक्ष यात्री बने।
तेलंगाना के दलित परिवार की 13 साल की पूर्णा ने अपने हौंसले और लगन की बदौलत एवरेस्ट की चोटी को छूने का साहस किया और सबसे कम उम्र में एवरेस्ट फतह करने वाली पर्वतारोही बन गई।
मात्र तेरह साल की उम्र में 8,848 मीटर ऊंचे और दुर्गम एवरेस्ट पर्वत को चढ़ने में सफलता पाने वाली पूर्णा का नाम गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज होने वाला है। खास बात ये है कि पूर्णा ने एवरेस्ट से पहले किसी तरह का पर्वतारोहण नहीं किया था।
कुछ नेपाली गाइडों के निर्देशन में पूर्णा और उसकी 16 साल की दोस्त ने चीन में तिब्बत की तरफ से एवरेस्ट पर चढ़ाई की। पूर्णा के कोच ने बताया कि एक औसत आय वर्ग के परिवार से संबंध रखने वाली पूर्णा के पिता के पास पर्याप्त पैसा नहीं था। ऐसे में सरकार की तरफ से पूर्णा को मदद मिली और उसका जोश भी बढ़ा।
सात माह की कष्टमय ट्रेनिंग के दौरान पूर्णा को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन उसने हार नहीं मानी। वो कभी पथरीले पहाड़ों पर चढ़ी तो कभी बर्फ से ढके पहाड़ों पर। एवरेस्ट की अपना सपना पूरा करने में पूर्णा को 52 दिन लगे। पूर्णा बताती है कि चढ़ाई काफी कठिन थी, उसकी सोच से कहीं ज्यादा। एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान उसने कई पर्वतारोहियों के शव देखे और विचलित भी हुई लेकिन अपने सपने को अधूरा छोड़ने का ख्याल उसके दिल में नहीं आया।
पूर्णा का कहना है कि एक आदिवासी और गरीब घर की लड़की होने के बावजूद जब मैं ये कर सकती हूं तो और बच्चे भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं। पूर्णा का सपना है कि वो सारी दुनिया की सभी चोटियों को फतह करे। पढ़ाई खत्म करने के बाद पूर्णा पुलिस अफसर बनने का सपना देखती है।