जब मैं नवीं कक्षा में आया, मुझसे पचपन साल बड़े मेरे पिता बूढ़े हो रहे थे। दुकान का काम उनसे हो नहीं पा रहा था। वैसे भी पढ़ाई में मेरा मन लगता नहीं था, मुझे लगा कि दुकान चलाना मेरे लिए ज्यादा अच्छा रहेगा। मैंने पिता के सामने यह प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने मान लिया। पढ़ाई छोड़कर मैंने मेहनत से दुकानदारी की और बहुत कम समय में परिवार को गरीबी से निकाला। इस दौरान प्रतिबंधित जगहों की खोजबीन करने का मेरा शौक जारी रहा।
मैं कई पुरानी चीजें इकट्ठा करता गया। दिल्ली की एक लड़की से 1982 में मेरी शादी हो गई। एक सज्जन की सलाह पर मैं अपनी खोजी चीजों को पोटली में लेकर एक रोज दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय गया। वहां एक प्रोफेसर को मैंने अपनी पूंजी दिखाई। उन पुरानी धातुओं को देख प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ। प्रोफेसर ने मुझे बिना टिकट पूरा संग्रहालय घूमने की अनुमति दी। मुझे अचंभा हुआ कि जिन चीजों को मैं रोज पहाड़ियों से इकट्ठा करता हूं, उन्हें किस तरह से संजोकर लोगों को दिखाया जाता है।
मुझे पहली बार उन पुरानी वस्तुओं का मूल्य समझ आया। उसके बाद तो मैं जब भी दिल्ली जाता, ससुराल बाद में पहले म्यूजियम का चक्कर लगाता। एक तरह से वह म्यूजियम ही मेरा गुरु बन गया। इसके बाद मैंने अपने काम में और तेजी लाई। जानकारी बढ़ी, तो धातुओं के अलावा मैंने कई विलक्षण चीजों की खोज की, जिनमें हजारों वर्ष पुरानी रंगीन रॉक पेंटिंग और पुराने टीले शामिल हैं। मैंने अब तक 102 रॉक पेंटिंग शृंखलाएं खोजी हैं।
एक रॉक पेंटिंग शृंखला पैंतीस किलोमीटर लंबी है। लोग कहते हैं, ऐसा काम किसी और ने नहीं किया है। मेरा सपना है कि आखिरी सांस तक मैं ऐसे ही प्रकृति के बीच घूमता रहूं, और अपनी खोजों को खुद के एक संग्रहालय में संजोऊं।