Muguda Suryanarayana Acharya
स्थायी रूप से उनकी यह समस्या खत्म करने के लिए उन्हें नगद सहायता के बजाय जमीन दान करना बेहतर रहेगा। मैंने उसकी बात मान कर लाखों रुपयों की अपनी समस्त बचत खर्च करके पास में ही 2.3 एकड़ जमीन खरीदी। तब तक तो सब ठीक था, लेकिन कुछ ही वक्त बाद मेरा बुरा समय शुरू हो गया। पैसों की तंगी के कारण मुझे वर्कशॉप समेत अपना घर तक बेचना पड़ गया। मैंने किराये के घर में रहना शुरू कर दिया। लेकिन मुफलिसी के दौर में भी जरूरतमंदों को जमीन दान करने के अपने संकल्प से मैं डिगा नहीं।
दो साल पहले मैंने सरकार से अपने लिए लीज पर जमीन लेने की दरख्वास्त की है, जो कि अभी तक लंबित है। बावजूद इसके मैंने अपना कारखाना लगाने के लिए उस जमीन के किसी भी हिस्से का प्रयोग नहीं किया, जो मैंने दान देने के लिए खरीदी थी। यही कारण है कि मैं हर महीने पंद्रह हजार रुपये बतौर किराया खर्च करता हूं।
मैं बचपन से ही रामायण, महाभारत, भागवत और पुराणों की शिक्षाओं को सुनते हुए बड़ा हुआ हूं। मुझे लगता है कि मैंने कुछ नहीं किया है। यह ईश्वर की इच्छा थी कि गरीबों को जमीन मिल जाए। मैं तो बस एक जरिया बना। कई मौके आए, जब रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े विभिन्न लोगों ने मेरी जमीन की कीमत करोड़ों में लगाई। पर पूरी दृढ़ता से हर बार उन्हें मेरा जवाब न में ही मिला।
आज मैं बहुत खुश हूं कि बीस साल पहले किए गए वायदे को मैंने पूरा करके दिखाया है। थोड़ा कष्ट होता है कि एक बड़े परिवार को किराये के घर में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है, लेकिन यह कष्ट उन ढाई सौ परिवारों के दुख के मुकाबले कुछ भी नहीं है, जिसका वे जमीन न होने के वक्त सामना करते थे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।