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प्राकृतिक आपदा और पिता से दूर होकर यासमीन ने चढ़ी सफलता की सीढ़ी और बन गईं समाजसेवी

Tue, 26 Jun 2018 02:08 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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बी यासमीन
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सब कुछ खो जाने के बाद भी मन के एक कोने में उम्मीद जिंदा रहती है। लेकिन जब आप वह उम्मीद भी खो देते हैं, तब नियति हमारे सामने कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती है, जिससे न केवल जीवन में अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है, बल्कि हमारे भीतर साहस भी पैदा हो जाता है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ। करीब डेढ़ दशक पहले आई एक प्राकृतिक आपदा में मैंने अपना सब कुछ खो दिया। उसी साल परिवारिक जीवन से नाखुश होकर मेरे पिता भी हमें छोड़ कर चले गए। मैं पोर्ट ब्लेयर के एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखती हूं। मेरी मां एक सरकारी मुलाजिम रही हैं, पर उनकी तनख्वाह कुछ खास नहीं थी। हम लकड़ी के बने एक सरकारी घर में रहते थे, जो सुनामी में पूरी तरह बर्बाद हो गया।
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मैं तब 10वीं कक्षा में थी। सुनामी के बाद हम लगभग सड़क पर आ गए। जब धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे, तब मैंने कुछ छोटे काम करने शुरू किए और किसी तरह से 12वीं कक्षा पास की। उसके बाद नौकरी की तलाश में मैं मुंबई आ गई, ताकि अपने घर वालों की आर्थिक मदद कर सकूं और अपने दो छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्च उठा सकूं। मुंबई में रहते हुए मैंने मुश्किल हालात में एमबीए किया। जीवन के इस संघर्ष में मैं हिम्मत हारने लगी थी, लेकिन मैंने पाया कि इस तरह जीवन बिताने वाली मैं अकेली नहीं थी। मेरे जैसे हजारों लोग संघर्ष कर रहे थे-कुछ सड़कों पर, कुछ अनाथालयों में। इन्हीं लोगों के बारे में सोचकर मैंने गरीबों के साथ समय बिताना शुरू कर दिया।
 
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मैं अनाथ आश्रम, स्टेशनों और झोपड़ियों में रोजाना जाने लगी और वहां के बच्चों के साथ घुल-मिलकर उनके साथ खेलने लगी। मैं जब भी उनके साथ होती, अपना दुख भूल जाती थी। ऐसा करना न जाने कब मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। मुझे ऐसा करते देख आस-पास के लोगों ने मेरे काम को न केवल सराहा, बल्कि करीब दस लोगों ने मेरे साथ जुड़कर गरीब बेसहारा लोगों की सहायता करनी भी शुरू कर दी।

कुछ ही समय बाद मुझे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। मैंने शादी कर ली और पति के साथ मिलकर चेन्नई में अपना खुद का व्यापार शुरू किया, पर मेरी संवेदनाएं उन गरीब बेसहारा लोगों के लिए कम नहीं हुई। मैं रोजाना चेन्नई में भी झुग्गी-झोपड़ियों में जाने लगी और वहां के गरीबों की मदद करनी शुरू की। इस बीच मेरी मुलाकात कुछ ट्रांसजेंडरों से हुई। वे स्नातक थे, पर ट्रांसजेंडर होने की वजह से उनके घर वालों ने उन्हें निकाल दिया था। मैं अक्सर उन्हें नई साड़ियां, खान-पान की चीजें और किताबें देती रहती हूं। मुंबई की तरह चेन्नई में भी मुझे शुरुआती दिक्कतें आईं।
 
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लोगों ने मुझ पर तरह-तरह के सवाल उठाए, पर मैंने अपना काम जारी रखा

स्थानीय लोगों ने मुझ पर तरह-तरह के सवाल उठाए, पर मैंने अपना काम जारी रखा। धीरे-धीरे वे भी मुझे समझने लगे और मुझसे घुल-मिल गए। अब वे मेरी गाड़ी पहचानते हैं और मेरे पहुंचते ही भागे चले आते हैं। इस सफर में मेरे पति ने मेरी सहायता की। हम दोनों अपनी आय का 50 प्रतिशत गरीब, बेसहारा लोगों के लिए निकाल देते हैं। मैं इस सेवा को लंबे समय तक जारी रखना चाहती हूं और जरूरतमंदों के लिए घर, मुफ्त भोजन, शिक्षा और रोजगार देना चाहती हूं। इसके लिए मैं एक संस्था बनाना चाहती हूं, जिसके लिए फिलहाल मैं पैसे जुटा रही हूं। मेरा मकसद ख्याति पाना कतई नहीं है, मैं सिर्फ अंडमान में रह रही अपनी मां को गर्व महसूस कराना चाहती हूं।
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