हर आम मां बाप की तरह रविंद्र के मां बाप की भी ख्वाहिश थी कि डॉक्टरी पढ़ रहा बेटा लाखों कमाएगा। लेकिन रविद्र कोल्हे की नीयत कहिए या नियति कि कॉलेज से निकलने के बाद जब चिकित्सा क्षेत्र की असल जमीं पर कदम रखा तो सबसे पहले उन्हें वो बीमार नजर आए जो केवल बीमार ही थे। बीमारी के अलावा उनके पास कुछ और था नहीं।
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ऐसे हालातों में महात्मा गांधी, विनोबा भावे और रस्किन बॉन्ड के विचारों ने कोल्हे पर अपना असर दिखाया। तीनों के विचारों की पूर्ति एक ही उद्देश्य में होती थी कि अगर मानवता के लिए काम करना चाहते हो तो उन लोगों के बीच जाकर काम करो जो सबसे ज्यादा गरीब और उपेक्षित हैं।
महापुरुषों को आदर्श मानकर कोल्हे ने गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के इलाकों का दौरा किया। महाराष्ट्र का गढ़चिरौली उन्हें रस्किन बॉन्ड के कथनानुसार नजर आया जहां सबसे दबे-पिछड़े लोग थे। इलाका नक्सल प्रभावित होने की वजह से कोल्हे की मां ने उन्हें सुझाया कि महाराष्ट्र का मेलघाट भी कमोवेश वैसा ही है और नक्सियों से मुक्त भी है। वहां भी जरूरतमंद बसते हैं। तब से कोल्हे ने मेलघाट को ही अपना घर बना लिया और इलाके की जनजातियों के बेसहारा, गरीब और अपेक्षित लोगों का इलाज करने लगे। कोल्हे के दिल में जनजातीय लोगों के प्रति इतनी संवेदना भर गई कि उनके इलाज में जेब से पैसे लगा देते। आज भी कोल्हे की फीस 2 रुपए और दूसरी दफा क्लीनिक आने पर 1 रुपए है।
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कोल्हे समाज के प्रति अपना दायित्व जानते हैं इसलिए इलाके की कोरकू जनजातीय को जब सरकार से अपेक्षित होना पड़ा तो कोल्हे ने सरकार को कोर्ट में खींच लिया। सरकार पर सीना ठोककर आरोप लगाया कि लोगों के प्रति जिम्मेदारी से सरकार आंखें चुरा रही है।
61 गांवों के हालातों को सुधारने में दिया योगदान
बीमारों का मसीहा
साल 1973-74 में वहां टाइगर प्रोजेक्ट के तहत टाइगर रिजर्व वाइल्डलाइफ सेंचुरी बनाने की घोषणा की गई। कुछ वर्षों में वन्यजीवों के अभ्यारण्य का पत्थर भी लग गया। टूरिस्ट भी आने लगे, लेकिन इलाके के 61 गांवों के हालात अब भी ऐसे थे कि वहां सड़कें नहीं थीं। दुर्गम रास्ते थे जो जंगलों से होकर जाते थे। आधुनिक जीवन की तमाम सुख-सुविधाएं तो बहुत दूर की बात, वहां बिजली तक नहीं थी। इलाकाई ठीक उन लोगों जैसे थे जो अक्सर सत्ताधारियों के भाषणों की जरूरत बनते हैं।
वो सबसे पिछड़े, सबसे गरीब, सबसे दबे-कुचले लोग थे। वो बीमार होते थे। उनके घरों के चूल्हे अक्सर ठंडे पड़े रहते थे। भोजन पर्याप्त था नहीं तो दवाईयां कहां लाते। उनके बच्चे पैदा होते और मर जाते। तंगहाली में कुपोषण उनकी जान ले लेता। लेकिन 31 साल पहले एक मसीहा वहां पहुंचा। वो उन लोगों के लिए ऊपर वाले के भेजे फरिश्ते जैसा साबित हुआ। मर रहे मासूमों में वो जान फूंकने लगा।
उसके काम का असर हुआ। गांव के लोग कम बीमार होते। वो फरिश्ता आज भी उनकी सेवा में तत्पर है। बगैर किसी सरकारी मदद के, निजी तौर पर उसने वहां के लोगों के लिए जो किया, उसकी तारीफ में शब्द कम पड़ते हैं। उसका संकल्प, जुझारूपन, उसकी ईमानदारी, दबे-कुचलों के प्रति उसकी संवेदना उसे हाड़-मास का जीता जागता भगवान बना देती है। अक्सर लोग डॉक्टर को भगवान कहते हैं। वो भगवानों जैसा ही डॉक्टर है। पूरी कहानी पढ़ेंगे तो आप भी यही कहेंगे।
जरूरत पड़ती तो 40 किलोमीटर पैदल चलते
मेलघाट के लोगों की भलाई में बड़ा योगदान
कोल्हे को मेलघाट में डेढ़ साल काम करने के बाद लगा कि लोगों की जरूरतों से मेल खाने के लिए उन्हें एमबीबीएस से भी ऊपर जाना होगा। कोल्हे ने वापस कॉलेज का रुख किया और चिकित्सा क्षेत्र की सर्वोच्च डिग्री एमडी की पढ़ाई पूरी की।
मेलघाट में उन दिनों दो सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र थे और कोई रास्ता नहीं था इसलिए धारनी से बैरागढ़ तक पहुंचने के लिए उन्हें पैदल ही तकरीबन 40 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करना पड़ता था।
साल 1989 में जब कोल्हे मेलघाट पहुंचे थे तब शिशु मृत्यु दर 200 प्रति हजार थी। लेकिन साल 2014 में ये संख्या घटकर 60 रह गई। कोल्हे की पत्नी स्मिता डॉक्टर हैं। मूल रूप से नागपुर की ही रहने वाली है। स्मिता भी अपने पति के काम में उसी जोश, जज्बे और जुनून के साथ हाथ बंटाती है।
कोल्हे की फीस आज भी 2 रुपए और दूसरी दफा क्लीनिक आने पर 1 रुपए हैं। कोल्हे कहते हैं कि तमाम एनजीओ उन्हें जोड़ने के लिए आते हैं। लेकिन कोल्हे कहते हैं कि अगर वह भी गैर सरकारी संगठन बना लेंगे तो उनका ध्यान चंद प्रोजेक्ट में ही सिमट कर रह जाएगा। वो अपना दायरा सीमित नहीं करना चाहते और जैसी जरूरत वैसा काम करना चाहते हैं।
लाखों लोगों के लिए प्रेरणादायी हो सकती है कोल्हे की कहानी
कोल्हे के योगदान पर किताब 'बैरागढ़' उपलब्ध
कोल्हे कहते हैं कि शायद नक्सलियों को लगता है कि हम भी सिस्टम को बदलने के लिए काम कर रहे हैं इसलिए वो हमसे नहीं उलझते हैं। कोल्हे दंपति के दो लड़के हैं। रोहित और राम। दोनों ने मेलघाट में ही पढ़ाई की। रोहित किसान बन चुका है। राम नागपुर से एमबीबीएस कर रहा है।
साल 2015 में डॉक्टर मनोहर नरंजे ने डॉक्टर कोल्हे और उनकी पत्नी स्मिता को समर्पित किताब 'बैरागढ़' लिखी।
कोल्हे ने महाराष्ट्र के विदर्भ के सबसे कुपोषित इलाके मेलघाट में जीवनदायनी कार्य किए। महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए कोल्हे दंपति जागरुकता अभियान भी चलाते हैं। इसके अलावा कई वर्षों से ये दंपति कृषि, बिजली उत्पादन और श्रम मजदूरी के लिए भी प्रयासरत है।
जिन इलाकों में आज भी अंध-विश्वास, जादू-टोना और झाड़-फूंक का बोलबाला है वहां आज भी रोजाना सैकड़ों लोग कोल्हे से इलाज कराने पहुंचते हैं।
आज मेलघाट की सूरत पहले से बिलकुल जुदा है। इलाके में 13 पीएचसी है, डॉक्टरों की संख्या भी 80 के करीब है। इलाके के 70 फीसदी गांव सड़कों से जुड़ गए हैं। लोगों में पहले से ज्यादा जागरुकता आई है। इलाके में करीब 300 एजीओ काम कर रहे हैं। ये सब संभव हो पाया है कोल्हे दंपति के अथक परिश्रम से।
55 साल के कोल्हे पत्नी स्मिता के साथ मेलघाट के जनजातीय जीवन की भलाई में आज भी उसी जज्बे के साथ लगे हुए हैं। लेकिन कोल्हे स्वभाव के बड़े सरल है, इसलिए खुद को निमित्त मात्र मानते हैं।