जमीन के इंतजाम के बाद अगला पड़ाव था, अस्पताल के लिए भवन निर्माण। इसके लिए मैंने कई दानदाताओं से संपर्क किया। कई लोगों ने मुझे दान दिया, लेकिन तेईस साल की लड़की सृष्टि घोष का दान मेरे लिए बहुत खास था, जिसने मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद पच्चीस हजार रुपये की अपनी पूरी पहली पगार मेरे अस्पताल की खातिर मुझे सौंप दी थी। सृष्टि से मेरी मुलाकात टैक्सी में हुई थी।
मैं उसके परिवार के साथ उसे अपनी कैब में बिठाकर ले जा रहा था। मेरी योजना के बारे में जानकर उसने उस वक्त मुझे सौ का नोट देकर अपना मोबाइल नंबर दिया था। पिछले साल जब उसकी नौकरी लगी, उसने मुझसे संपर्क किया। कई लोगों ने इससे ज्यादा दान दिया है, लेकिन मैंने सृष्टि में अपनी बहन का अक्स देखा है।
बारह साल की मेहनत के बाद कुल अड़तीस लाख की लागत में आखिरकार मेरे पुनरी गांव में अस्पताल बनकर तैयार हो गया। अस्पताल का नाम मैंने अपनी बहन के नाम पर 'मारुफा स्मृति वेलफेयर फाउंडेशन' रखा है। इस अस्पताल के बन जाने के बाद आसपास के छोटे-बड़े कुल सौ गांवों को फायदा होगा। अभी अस्पताल में शुरुआती सुविधाएं ही उपलब्ध हैं, मगर धीरे-धीरे यहां सभी सुविधाएं होंगी, जो या तो निःशुल्क या फिर कम से कम लागत पर गरीबों के इलाज के लिए उपलब्ध रहेंगी।
मेरा मकसद भी यही था कि वे गरीब, जो पैसों के अभाव में बड़े अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते हैं, उन्हें कम लागत में उचित इलाज मुहैया हो सके। ताकि किसी को भी अपनी मारुफा से महरूम न होना पड़े। अस्पताल तो बन गया है, लेकिन मरीजों की देखभाल के लिए नर्सों की भी जरूरत होगी। इसके लिए मैं एक नर्सिंग स्कूल खोलना चाहता हूं, जिससे स्थानीय लड़कियों को नर्सिंग की ट्रेनिंग देकर उन्हें रोजगार दिया जा सके।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।