उम्र से लंबी सड़कें और कुछ जिद्दी सपने। दिल्ली की शन्नो बेगम चाहती थीं कि वह अपने तीन बच्चों की परवरिश में कोई कसर न छोड़ें। लेकिन महानगर की जिंदगी में सपने देखने के लिए पैसे चाहिए होते हैं। पति की मौत के बाद गृहस्थी की गाड़ी को ढोते-ढोते थक चुकी शान्नो को तो पहले यही लगा था कि जिंदगी पटरी से उतर चुकी है।
लेकिन तभी मन के कोने से आवाज आई, ‘बस इतने से थक गई शान्नो!’ दूसरे ही पल शन्नो के सामने उसकी जिंदगी का रोडमैप तैयार हो चुका था। उसने फिर से पढ़ाई शुरू कर दी। कुक से लेकर केयर टेकर का काम किया। बड़ी बेटी की शादी की। छोटी बेटी का बीए में दाखिला करवाया और बेटे को स्कूल भेजा।
एक दिन उन्हें पता चला कि आजाद फाउंडेशन की ओर से छह महीने का एक निशुल्क ड्राइविंग कोर्स कराया जा रहा है। शन्नो ने वह कोर्स कर लिया। कोर्स के बाद उसने कुछ लोगों की निजी गाड़ियां चलाईं। फिर 40 साल की उम्र में वह दिल्ली की पहली महिला कैब ड्राइवर बन गईं। अभी वह उबर की पहली महिला चालक है। सड़कों पर चलते हुए शन्नो को लगता है, ‘मानो सपने भी साथ-साथ चल रहे हों।’