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वो विकलांग था, मां के साथ चूड़ी बेचता था लेकिन बना आईएएस अधिकारी

Mon, 02 May 2016 05:36 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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रमेश घोलप, आईएएस अधिकारी - फोटो : facebook
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पारिवारिक हालातों के चलते रामू को मां के साथ चूड़ियां बेचनी पड़ीं। बचपन में पोलियो हो गया सो अलग। लेकिन जज्बा देखिए, आईएएस बनकर दम लिया।
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ये स्टोरी उन लाखों युवाओं के सपनों में प्राण फूंक सकती है जो सिविल सर्विसेज में भर्ती होकर देश और समाज की सेवा करना चाहते हैं। जो चाहते हैं कि देश भ्रष्टाचार मुक्त हो।

कहानी ऐसे शख्स की है जिसका बचपन विक्लांगता और परिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया। लेकिन उसने हालातों को बैसाखी नहीं बनाया। एक से बढ़कर एक कठिनाईयां सामने आईं, उसने डटकर सामना किया। आज दुनिया उसे आईएएस रमेश घोलप के नाम से जानती है। हजारों हाथ उसकी दुआ में उठते हैं, उसे सलाम करते हैं। उसकी कामयाबी ने गांव भर के आंसू पोंछे हैं। 
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आर्थिक तंगी से उसके पिता ने गैर जिम्मेदाराना सरकारी अस्पताल और डॉक्टरों की बेरुखी से इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। लेकिन वो चाहता है कि कोई बाप पैसों और इलाज के अभाव में दम न तोड़े। हालातों के चलते किसी बच्चे का बचपन और मासूमियत न छिने। किसी मां को घर चलाने के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें। 

बेशक वो महाराष्ट्र का रहने वाला है लेकिन आज पूरे देश का हीरो है। चूड़ी बेचने वाले रामू से आईएएस रमेश बनने तक की पूरी सक्सेस स्टोरी अगली स्लाइड में पढ़ें।

विषम परिस्थितियों का सामना कर पहुंचे सफलता के शिखर पर

- फोटो : facebook
महाराष्ट्र के महागांव में पिता गोरख घोलप साइकिल की दुकान चलाते थे। शराब पीने के आदी थे। चार लोगों का परिवार था, लेकिन सारी कमाई शराब में चली जाती थी। गुजर-बसर बड़ी मुश्किल में हो रही थी। तंगहाली ने तब पूरा मुंह बा दिया जब पीने की आदत के चलते रामू के पिता सरकारी अस्पताल में भर्ती हो गए। 

अब घर की सारी जिम्मेदारी रामू की मां विमल घोलप के कंधों पर थी। मां चूड़ियां बेचने लगी। रामू के बाएं पैर में पोलियो मार गया था। लेकिन तंगहाली में अपने भाई के साथ मिलकर मां के काम में हाथ बंटाने लगा। रामू भी गली-गली में चिल्लाता... चूड़ियां ले लो।

महागांव में केवल प्राथमिक विद्यालय था। इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए रामू बरसी स्थित चाचा के घर चला गया। रामू को पता था कि शिक्षा ही उसे, उसकी मां और पूरे परिवार को गरीबी के दलदल से निकाल सकती है।

हालातों ने राजू को जरूरत से ज्यादा गंभीर कर दिया था। वो मन लगाकर पढ़ता था। सभी टीचर उसे पसंद करते थे। लेकिन साल 2005 के दौरान जब वह 12वीं की मॉडल परीक्षा की तैयारी में जुटा था तभी उसके पिता की मौत की खबर आ गई। उस दौरान बरसी से महागांव जाने के लिए बस का किराया सात रुपए होता था। लेकिन उसके पास विक्लांग प्रमाण पत्र था तो दो रुपए किराया लगता था। लेकिन रामू के पास तब दो रुपए भी नहीं थे कि अपने पिता की अंतिम यात्रा में जा सके। 

बचपन में सरकारी भ्रष्टाचार करीब से देखा, आज लगाते हैं भ्रष्टाचारियों की लंका

- फोटो : facebook
लेकिन पड़ोसियों ने उसकी मदद की और वो पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। पिता की मौत ने रामू को सदमे में ला दिया था। लेकिन फाइनल एक्जाम तक रामू दुख से उबर चुका था। टीचरों के समझाने पर उसने खूब मेहनत की और 12वीं में 88.5 फीसदी अंकों के साथ पास हुआ।

12वीं के बाद रामू ने डिप्लोमा इन एजुकेशन कर लिया ताकि टीचर की नौकरी पाकर पारिवारिक जिम्मेदारियों का भार उठा सके। डिप्लोमा करने के दौरान की उसने ओपन यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में ग्रेजुएशन कर ली। साल 2009 में वो टीचर भी बन गया। लेकिन ये रामू का वो सपना नहीं था जो उसने देखा था।

रामू अपने परिवार के अलावा अपने गांव-समाज से भी बुराइयां खत्म करना चाहता था। उसने देखा था कि जब उसकी मां सरकारी आवास योजना के तहत अधिकारियों के पास चक्कर पर चक्कर लगाती रही थी। कोटेदार सरकारी मिट्टी का तेल जरूरतमंदों को नहीं बल्कि ब्लैक मार्केट में बेच देता था। सरकारी अस्पताल में पिता के सरकारी डॉक्टरों की उदासीनता के शिकार रह थे। सरकारी अधिकारी उसकी मां और अन्य विधावाओं की पैशन खा जाते थे।

इसलिए रामू ने फैसला किया कि वो यूपीएससी का एक्जाम निकालेगा। उसने 6 महीनों के लिए नौकरी छोड़ी। उसकी मां ने गांव के कुछ लोगों से पैसे जुटाए थे। उन पैसों को लेकर रामू ने पुणे का रुख किया और सिविल सेवा परीक्षा के लिए सेल्फ स्टडी करने लगा। साल 2010 में रामू को सफलता नहीं मिली। उसके बाद रामू ने पंचायत के चुनाव में मां को बतौर सरपंच उम्मीदवार उतारा। कुछ वोटों से पीछे रह गया। लेकिन इस हार ने रामू को हालातों से जूझने की प्रेरणा दी और रामू ने सभी गांव वालों के सामने एलान कर दिया कि जब तक वह एक अफसर नहीं बन जाएगा वो गांव में मुंह नहीं दिखाएगा।
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जरूरतमंदों और असहाय लोगों के बने मसीहा, देते हैं साथ

जरूरतमंदों और असहाय लोगों के बने मसीहा, देते हैं साथ - फोटो : facebook
इस कसम के बाद रामू नहीं रुका। उसने स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ एडमिनस्ट्रेटिव करियर्स एक्जाम निकाला, इससे उसे रहने के लिए हॉस्टल और गुजारा करने के लिए बजीफा मिल गया। जरूरतें पूरी करने के लिए उसने पोस्टर रंगना शुरू कर दिया। आखिरकार बिना किसी कोचिंग के अनपढ़ मां-बाप के रामू ने यूपीएससी एक्जाम में 287 रैंक हासिल कर सफलता का कीर्तिमान रचा। 

रामू साल 2012 में आईएएस रमेश घोलप बन गया। जैसा कि उसने गांव वालों से वादा किया था कि अधिकारी बनकर ही मुंह दिखाएगा, वह अर्से बाद गांव गया। 

साल 2012 में रमेश ने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा दी तो सबसे ज्यादा अंकों के साथ पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। रमेश को 1244 अंक मिले थे जबकि पिछले रिकॉर्ड के मुताबिक 1800 अंक सबसे ज्यादा थे।

रमेश घोलप झारखंड में ऊर्जा विभाग में बतौर ज्वाइंट सेक्रेटरी (संयुक्त सचिव) तैनात हैं। रमेश की मां कहती हैं कि वो कभी पढ़ नहीं सकीं, लेकिन उन्होंने निश्चय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए लड़के को जरूर पढाएंगी। आज रमेश अफसर है ये देखकर मां फूले नहीं समाती हैं। वो कहती हैं कि बेटे ने उनके सारे ऋण चुका दिए।

रमेश घोलप एमपीएससी और यूपीएससी की तैयारी में जुटे युवाओं को 300 से ज्यादा प्रेरक ब्याख्यान दे चुके हैं। वह गरीब और असहाय लोगों की मदद कर अपना सपना पूरा ही नहीं, बल्कि उसे जी रहे हैं।

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स्टोरी सोर्स-www.thebetterindia.com
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