वह बहुत भीषण दुर्घटना थी। छह महीने से ज्यादा वक्त तक मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। तमाम तरह के ऑपरेशन हुए। अच्छी बात यही थी कि भयानक दुर्घटना के बावजूद मेरी आंखें सही-सलामत बच गई थीं। डॉक्टरों के मुताबिक यह बिल्कुल चमत्कार सरीखा था। क्योंकि आंखों के चारों तरफ गंभीर चोटें आई थीं। दुनिया को पहले ही जैसे देख पाना मेरे लिए भी एक सुखद आश्चर्य था। लेकिन उस घटना ने मेरे दिमाग में उन लाखों लोगों की तस्वीर जरूर उकेर दी, जो देखने में अक्षम हैं। रह-रहकर मैं उन्हीं दृष्टिबाधित लोगों के बारे में सोचता।
सोचता भी क्यों नहीं, एक महीन लकीर ही बची थी मेरे और उन जैसे लोगों के बीच। मेरा मन बार-बार वही लकीर लांघ रहा था।दृष्टिबाधित लोगों के लिए काम करने के लिए कुछ इस तरह पहली बार मैंने सोचा था। इससे पहले मैंने अपने करियर में संपादक और लेखक की भूमिका निभाई है।
लेकिन बाद में मैंने प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में आने को इच्छुक अभ्यर्थियों को पढ़ाना शुरू कर दिया। मेरे पढ़ाए साढ़े तीन सौ से ज्यादा
अभ्यर्थी आज शीर्ष सरकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। उस घटना के बाद 2010 से मैंने अपनी कोचिंग का दायरा शारीरिक रूप से अक्षम अभ्यर्थियों तक बढ़ा दिया, जिनमें दृष्टिबाधित छात्र प्रमुख थे। इन विशेष छात्रों को पढ़ाते वक्त मैंने पाया कि इनकी आकांक्षा बैंक आदि में स्नातक स्तर की विभिन्न सरकारी नौकरियों तक सीमित है। और वे लोग यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा के लिए आत्मविश्वास नहीं जुटा पाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि कई दिव्यांग अधिकारी उच्च पदों पर आसीन हैं।
मैं चाहता था कि ये लोग भी शीर्ष स्तर के आईएएस अधिकारी बनें। मुझे पता था कि इनमें सामान्य लोगों के मुकाबले क्षमताओं की कोई कमी नहीं है। हां, इन विशेष लोगों के लिए विशेष संसाधनों का जरूर टोटा है। आमतौर पर दृष्टिहीन लोग ब्रेल लिपि की मदद से पढ़ाई करते हैं, जबकि यूपीएससी की तैयारी के लिए जरूरी पाठ्यक्रम का महज बीस फीसदी हिस्सा ही ब्रेल लिपि में उपलब्ध है। पढ़ने के दूसरे तरीके जैसे, ऑडियो-वीडियो माध्यम भी इनके लिए पर्याप्त नहीं हैं। मतलब यह पूरी तरह दूसरों पर आश्रित होते हैं कि कोई इन्हें किताब पढ़कर सुनाए, जो कि हमेशा व्यावहारिक नहीं होता।
दो साल पहले मेरा अमेरिका जाना हुआ। मैंने वहां देखा कि दृष्टिबाधित लोगों के पढ़ने-लिखने के लिए तमाम तरह की सहूलियतें मौजूद हैं। मैंने तभी सोच लिया कि मैं कुछ ऐसा ही अपने भारतीय छात्रों के लिए करूंगा। उसी साल मैंने अपना ब्रेल और ऑडियो प्रोजेक्ट शुरू कर दिया। जिसमें मेरा साथ दिया दो दिव्यांग सरकारी अधिकारियों ने। ये दोनों मेरे पूर्व छात्र रहे हैं और अब मेरे साथ मिलकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं।
इनके साथ मिलकर हमनें दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए पैंतीस किताबें तैयार कर लीं, जो कि किसी भी यूपीएससी की तैयारी करने वाले के लिए बेहद जरूरी होती हैं। इसके बाद मैं इन किताबों का ब्रेल संस्करण तैयार करने में जुट गया। इसी साल फरवरी में हमारा प्रोजेक्ट पूरा हो गया। इस पूरी प्रक्रिया में मैंने अपनी बचत में से पांच लाख रुपये खर्च किए हैं। मेरी किताबों की ताकत यह है कि मैंने इनमें पूरे पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण हिस्सों को शामिल किया है।