कुछ समय पहले इंचियोन (दक्षिण कोरिया) में तीन अन्य खिलाडिय़ों टिंटू लुका, मनदीप कौर और पोम्मा एम.आर. के साथ मिलकर 4 गुणा 400 मीटर रिले रेस में सोना लाकर देश का नाम रोशन करने वाली प्रियंका पवार लड़कियों के लिए एक मिसाल हैं। मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) की रहने वाली प्रियंका की आंखों में अब ओलंपिक में मेडल जीतने का सपना है। अभी प्रियंका रेलवे में जूनियर क्लर्क के रूप में कार्यरत हैं। पेश है, उनसे एक मुलाकात :
आपकी अभी तक की क्या उपलब्धियां हैं?
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि 2014 के एशियन गेम्स में जीता गोल्ड मेडल ही है। सबसे पहले मैंने भुवनेश्वर में 2005 में आयोजित राष्ट्रीय खेलों (नेशनल गेम्स) में हिस्सा लिया, जिसमें 100, 200, 400, 4 गुणा 100 और 4 गुणा 400 रिले रेस में गोल्ड हासिल किया। 2010 में ढाका में सैफ गेम्स और ईरान में एशियन इंडोर गेम्स में भी मेडल प्राप्त किए। मेडल जीतने की कोशिश निरंतर जारी है।
क्या बचपन से ही खिलाड़ी बनने की इच्छा थी?
बिल्कुल नहीं। पर पापा दौड़ लगवाने के लिए ले जाते थे, तो वहीं से दौडऩा सीखा। जब मैं सातवीं में थी, तो स्कूल की एक दौड़ प्रतियोगिता में मुझे भाग लेने का मौका मिला, जिसमें मैं जीत गई। उसके बाद मैने इस पर गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया।
दौड़ना आपको कितना रोमांचक लगता है?
मैं बहुत अच्छा दौड़ती हूं। बचपन में जब दौड़ में मैं लड़कों को पीछे छोड़ देती थी, तो बहुत मजा आता था।
क्या चुनौतियां आपके सामने आईं?
मैं जिस समुदाय से हूं, वहां लड़कियों को खेल में भेजने पर भी कोई खास रूचि नहीं दिखाई जाती। ऐसे में मुश्किलें तो आनी ही थीं। मेरी सारी उपलब्धियों की वजह मेरे पापा हैं। उन्होंने ही मेरी आंखों में सपना पैदा किया।
ट्रेनिंग कहां से ली?
वैसे तो जितने भी एथलीट होते हैं, वे सब गांव की मिट्टी से ही पैदा होते हैं। लेकिन खुद को ज्यादा मांजने के लिए पापा ने लखनऊ के गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट़्स कॉलेज में मेरा दाखिला करा दिया। बाद में 2004 में दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में भी मैंने तीन साल तक प्रशिक्षण लिया।
आप दौड़ की किस श्रेणी में खुद को अव्वल पाती हैं?
मैं 100 मीटर फर्राटा से लेकर 200 मीटर, 400 मीटर, 4 गुणा 400 मीटर रिले और 4 गुणा 100 मीटर रिले, सबमें खुद को कंफरटेबल पाती हूं। फिलहाल एशियन गेम्स में 4 गुणा 400 मीटर रिले में मिले गोल्ड के कारण ओलंपिक के लिए इसी पर फोकस कर रही हूं।
देश की लड़कियों से क्या कहना चाहेंगी?
मैं लड़कियों से यही कहूंगी कि वे सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए जी जान से जुट जाएं। साथ ही अभिभावकों से अपील करूंगी कि वे अपनी बेटियों को आगे बढ़ाने में सहयोग करें। हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लड़कियां सिर्फ रोटियां बनाने के लिए नहीं जन्मी हैं। वे भी सपने देखना और उन्हें पूरा करना जानती हैं। इसलिए उन्हें मौका दिया जाए, क्षेत्र चाहे जो भी हो।
सरकार से कितना सहयोग मिलता है?
राज्य और केंद्र सरकार से सहयोग मिलता है। तभी हम आगे जा पाते हैं। लेकिन शुरूआत में भी कुछ सुविधाएं सरकार की ओर से मुहैया कराई जानी चाहिए, ताकि कोई अपने कदम पैसे या सुविधाओं की कमी के कारण पीछे न हटाए।
प्रिया गौतम