मुंबई के रहने वाले पवन शेट्टी ने बीकॉम किया और देश के बाकी बेरोजगारों की तरह बेरोजगार हो गया। साथ में एक और बड़ी मुश्किल थी कि घर का एक करीबी जो बीमार था। उसकी भी देख-रेख करनी थी सो अलग। ऐसे ही लगभग एक साल बीत गया लेकिन पवन को अपनी परेशानी का इल्म था। उसे पता था कि मुंबई में जिंदा रहना है तो जल्दी कमाना शुरू करना होगा। एक दिन अखबार में एक विज्ञापन दिखा और पवन ने अप्लाई कर दिया।
आखिरकार पवन को नौकरी मिल गई। नौकरी थी सेल्स मैन की। वो सेल्स मैन जो आपके घर तक आकर आपको सामान बेचता है। आज से 17 साल पहले यानि 1999 में पवन फाइनेंसियल एक्सप्रेस का सेल्स मैन था।
पवन का कहना है कि "मैंने यह काम लगभग 6 महीने तक किया और यही जॉब थी जिसने मुझे बोलना सिखा दिया। मेरी झिझक खत्म हो गई थी। मैं लोगों के दरवाजे-दरवाजे जा कर सामान बेचने का काम करता था और इसके लिए 8-8 किलोमीटर तक भी चलना पड़ता था।"
साल 2000 में चीजें बदल गईं
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पवन ने बताया 'फाइनेंसियल एक्सप्रेस में सेल्स मेन की नौकरी करने के बाद मेरा मन बैंकिंग में जाने का हुआ। एचएसबीसी में इंटरव्यू दिया और नौकरी लग गई लेकिन मेरे पास कोई स्पेशल नॉलेज नहीं थr। इस वजह से मुझे जनरल जॉब में रख लिया गया। यहीं से मेरा मन हुआ कि अब MBA करना है। लेकिन इसका भी ध्यान रखना था कि ज्यादा पैसे न खर्च हो जाएं। CET का टेस्ट दिया और सिलेक्शन हो गया।" एडमिशन मिल गया मुंबई के ही सिडन्ह्म कॉलेज में।
साल 2003 में MBA करते हुए गुजरात की एक मोटर कम्पनी में इंटर्न का काम मिला। लगभग 2 महीने तक वहां इंटर्नशिप की। जिसमें मोटर कम्पनी के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। 2004 में जब कोर्स खत्म होने वाला था। कैंपस में प्लेसमेंट का वक़्त आया। सभी अपनी-अपनी नौकरियों की तैयारी में थे। पवन भी अपनी नौकरी की तैयारी में थे। पवन चाहते थे कि किसी ऐसी कम्पनी में नौकरी मिल जाए जो रोजमर्रा के सामान बनाती हो। हिंदुस्तान यूनीलीवर कैंपस पहुंची। लेकिन टेंशन में पवन का इंटरव्यू ठीक नहीं हुआ। और नौकरी मिली नहीं।
अगली कंपनी
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फिर अगली कम्पनी का इंतज़ार था। अगली कम्पनी थी टाटा मोटर्स। इंटरव्यू हुआ और नौकरी मिल गई। प्रोडक्ट अकाउंट मैनेजर के पोस्ट पर काम शुरू हुआ। टाटा मोटर्स के मुम्बई ब्रांच में पोस्टिंग थी। वहां छोटी कारों की डील नहीं होती थी, वहां ट्रक की डील होती थी। एक-एक बार में 100-150 ट्रक की डील होती थी।
टाटा मोटर्स में 2 साल तक काम करने के बाद 2007 में फोर्ड इंडिया से ऑफर मिला। इनके गुजरात का बिज़नेस कुछ ठीक नहीं जा रहा था। उसमें कुछ सुधार करना था। शुरू के 2 साल पवन ने वहां सेल्स का काम देखा। फिर अगले 2 साल तक सेल्स और मार्केटिंग दोनों का काम देखा। गुजरात में फोर्ड की हालत बहुत कुछ सुधर गई थी। यहां से पवन को कारों का अंदाज़ा भी हो गया था।
साल 2012 में लम्बोर्गिनी इंडिया
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पवन कहते हैं, "अब ये टाईम था जब मैं मुंबई से ज्यादा दूर या बाहर नहीं जाना चाहता था। मुझे दिल्ली वगैरह से ऑफर मिल रहे थे। लेकिन मेरा कहीं जाने का मन नहीं था। लम्बोर्गिनी के बारे में एक कंसलटेंट ने बताया। मुझे उसने बताया कि एक जॉब है, जहां साल में 10-15 कार ही बेचनी है। मैं भी बिना ज्यादा सोचे मीटिंग के लिए पहुंच गया। और जब मुझे कम्पनी का नाम पता चला, मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। यहां मुझे सब कुछ खुद से तैयार करना था। कंपनी के इंडिया ऑपरेशन की शुरुआत करनी थी। तो ऐसा लगा जैसे बिना पैसे लगाए खुद का बिज़नेस तैयार कर रहा हूं।"
साल 2016 में पॉर्श इंडिया
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इतने सालों तक लम्बोर्गिनी का ऑपरेशन देखने के बाद। अब जब स्विच करना था तो इस बात का भी ध्यान रखना था कि अगली कंपनी इससे बड़ी हो। तो अब हिन्दुस्तान की सड़कों पर दौड़ने वाली सबसे महंगी कारों में से एक पॉर्श इंडिया के डायरेक्टर हो गए हैं, पवन शेट्टी। पवन का कहना है कि "अब मुझे ये भी देखना था कि बड़ी कम्पनियों में जहां ज्यादा कारों की डील होती है वहां का ऑपरेशन कैसा होता है और सीखने का मौका भी ज्यादा मिलेगा।"
वैसे आपको बता दें जितनी आसानी से आपने ये 17 साल कुछ लाईनों में पढ़ लिया। ये जर्नी इतनी भी आसान नहीं रही होगी। ये ठीक वैसी ही बात है कि लोग कहते हैं रातों रात बड़ा आदमी बन गया लेकिन कोई ये नहीं समझता है वो रात 17 साल लम्बी थी। उन रातों में कई महीनों की नींद गुम हुई होगी। हां, एक और बात है अगर मेहनत करने की लगन हो तो इंसान ज़िंदगी में कोई भी मुकाम हासिल कर सकता है।