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यहां झुग्गी में पढ़ने वाले बच्चों के नाम पर रखे जाते हैं गलियों और रास्तों के नाम

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वंचितों की शिक्षा के लिए अनूठी पहल - फोटो : adageindia.in
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देश की एक बड़ी आबादी मलिन बस्तियों, झुग्गी-झोपड़ियों में गुजर-बसर करती है। वो हमेशा अभाव में होती है। उसकी बुनियादी जरूरतें तक न पूरे होने वाले ख्वाबों सरीखी होती हैं। लेकिन देश की सियासत उन्हें बेशकीमती वोट बैंक मानती है।
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झुग्गियों की जिंदगी बेरंग सही, सियासतदानों और बुद्धिजीवियों के भाषणों और आलेखों की शोभा जरूर बढ़ाती है। उनके मुद्दों पर बहस होती है, बहस गरम होती है, और उसकी आंच पर सियासी दल रोटियां सेक लेते हैं कभी 'साक्षरता मिशन' के नाम पर तो कभी 'सब पढ़े और सब बढ़ें' के जुमले पर।

लेकिन सब जानते हैं कि आजादी के 69 साल बाद भी अगर वे झुग्गियां हैं, मलिन बस्तियां हैं, उनके बच्चे कुपोषण का जीवन जी रहे हैं और नाजुक उम्र में कंट्रक्शन साइटों का ईंट-गारा उठा रहे हैं तो इसका असल जिम्मेदार कौन है। 
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कुछ लोग इसे भगवान की मर्जी बताते हैं, कुछ सरकारी अनदेखी तो कुछ उनकी किस्मत पर ठीकरा फोड़ देते हैं। लेकिन एक तर्क संगत वजह भी है, और वो है 'अशिक्षा'।

देश में शिक्षा का अधिकार कानून पहले से है। उन्हें शिक्षित करने की ढेरों योजनाएं बनीं। पहल की गईं। रजिस्टर भी भरे गए। लेकिन वे अनपढ़ के अनपढ़ रह गए। उन बदहाल, लाचार, बेहद गरीब मायूसी परस्तों की जिंदगी में उजाला लाने के लिए अब मुंबई की एक गैर सरकारी संस्था खास ढंग से आगे आई है। संस्था के प्रयास इतने जबरदस्त हैं कि बच्चे पढ़ने के लिए खिंचे चले आते हैं। हालांकि ये संस्था बीते 28 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही हैं। संस्था तीन सौ स्कूलों के जरिए फिलहाल तकरीबन चार हजार बच्चों की जिंदगी में शिक्षा की अलख जगा रही है। आगे की स्लाइड में पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी।

बच्चों के अलावा उनके माता-पिता को भी जागरूक करने की मुहिम

'सभी योगदान दें' - फोटो : ndtv
एनजीओ 'डोर स्टेप स्कूल' साल 1988 में मुंबई में अस्तित्व में आई। साल 1993 में पुणे में काम शुरू किया। डोर स्टेप स्कूल ने समाज के बेहद गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षित करने का वीणा उठाया। हाल ही में एक प्रभावशाली तरीके ने मुंबई की झुग्गियों के बच्चों का ध्यान पढ़ाई की ओर खींचने में कामयाबी पाई। एनजीओ ने स्ट्रीट नेमिंग कैंपेन चलाया। इस मुहिम के तहत जो बच्चे पढ़ाई में अच्छा करते हैं उनके नाम पर गलियों के नाम रख दिए जाते हैं। 

शिक्षा की ओर इस सकारात्मक पहल में स्थानीय पार्षद भी सहयोग करने लगे हैं। वे बच्चे भी प्रेरित हो रहे हैं जिन्होंने कभी पट्टी-बस्ता हाथों से नहीं उठाया और स्कूल के दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। उनके मां-बाप भी चाहते हैं कि बच्चों के नाम पर सड़क का नाम हो जाए।

समाज के सबसे दबे-कुचले, जरूरतमंद और कुपोषित बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की मुहिम को जिन मजबूत कंधों ने संभाला उनमें रजनी परांजपे और बीना सेठ लश्कारी बड़े नाम हैं। 

रजनी परांजपे से हमारी बात हुई। रजनी बताती हैं कि उनकी संस्था के प्रयास महज झुग्गियों तक ही सीमित नहीं हैं। वे मुंबई और पुणे में उन बच्चों को भी शिक्षित करने के प्रयास में लगी हैं जो हालातों के चलते मजदूर हो गए हैं और सैकड़ों कंस्ट्रक्शन साइटों में काम कर रहे हैं। रजनी ये भी बताती हैं कि बच्चों को शिक्षित करने के लिए ये भी जरूरी है कि उनके माता-पिता को भी शिक्षित किया जाए। और ये तभी संभव है जब हर जागरुक इंसान समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे और आगे आए। 

रजनी कहती है कि उनकी संस्था ने साक्षरता की इस मुहिम में सभी लोगों के जुड़ने का आह्वान किया है। कॉलेज स्टूडेंट भी अपना योगदान दे सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा जागरुक लोग इस मुहिम से जुड़ेंगे तो सफलता निश्चित ही मिलेगी।
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रंग ला रही हैं डोर स्टेप स्कूल के प्रयास

'आप भी कल के भविष्य को संवारने के लिए जुड़ें' - फोटो : adageindia.in
डोर स्टेप स्कूल की सक्रियता और प्रयासों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुंबई में करीब एक हजार तो पुणे में साढ़े सात सौ सदस्यों का स्टाफ मुहिम को आगे बढ़ा रहा है। संस्था कम्युनिटी बेस्ड एजुकेशनल प्रोग्राम, स्कूल पार्टनरशिप प्रोग्राम, सपोर्टिव सर्विसेज, ट्रेनिंग सेल और स्कूल्स ऑन व्हील्स के जरिए काम करती है। संस्था के तमाम प्रयास मीडिया का ध्यान भी अपनी ओर खींच रहे हैं। 

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में 27 वर्षीय रेहमुद्दीन सेख ने बताया कि वे स्कूल छोड़ चुके थे। स्टेट लेवल के रग्बी खिलाड़ी हो गए थे। लेकिन उनका नाम कुछ ही लोग जानते थे। लेकिन जब से डोर स्टेप स्कूल ने उनके नाम की तख्ती लगाकर रेहमुद्दीन मार्ग बनाया है। वे आत्मविश्वास से लबरेज हो गए हैं और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की हिम्मत रखते हैं। रेहमुद्दीन बी.ए. की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं।
 
देवी चौहान की उम्र 15 साल है। देवी चौथी कक्षा में थीं जब हालातों के चलते पढ़ाई छूट गई। उनको भी इस मुहिम से जोड़ा गया। देवी चौहान मार्ग बनने के बाद अब वे आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं और आर्टिस्ट बनने की सोच रही हैं।

इसी तरह ओमकार तोरड मार्ग, अनिता राठोड मार्ग, खुशी दास मार्ग आदी रास्ते झुग्गियों को आसान पता दे रहे हैं और अन्य लोगों के लिए बेहतर भविष्य बनाने के प्रेरणाश्रोत भी बन रहे हैं।

मुंबई में इस मुहिम से तीन झुग्गी बस्तियां जुड़ चुकी हैं। इनमें परेड की बालासाहब अंबेडकर नगर चॉल, गोवंदी की हीरानंदानी आक्रुती चॉल और मनखुर्द की महाराष्ट्र नगर रिक्शा स्टैंड चॉल शामिल हैं। डोर स्टेप स्कूल के प्रयासों से सीख लेकर अन्य एनजीओ भी साथ आ रहे हैं और मिलकर शुभ कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।

आप भी अगर वंचित बच्चों को शिक्षित करने की इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं तो संस्था की वेबसाइट www.doorstepschool.org पर संपर्क कर पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं। 

आपको ये कहानी कैसी, कमेंट बॉक्स में प्रतिक्रिया देना न भूलें। चाहें तो इसे शेयर भी कर सकते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे प्रेरणा मिल सके।
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