वो महज 7 महीने की थी जब पोलियो के हमले ने उसका 80 फीसदी शरीर खराब कर दिया। बड़ी हुई तो पोस्ट पोलियो अटैक पड़ गया। रीढ़ की हड्डी और कमर ने जवाब दे दिया। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। साल भर में मौत तय थी।
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लेकिन उसे यूं मरना गंवारा नहीं था। उसने हिम्मत जुटाई। नई शुरुआत करने की ठान ली। किसी ने कहा कि हाईड्रोथेरेपी (जल चिकित्सा) से आराम मिल सकता है। शुरू में तो सिखाने वाला ट्रेनर भी नहीं मिला। उसने खुद तैरना शुरू किया।
किस्मत कदम-कदम पर उसे यातनाएं देती रही और वो हंस-हंस कर उसे आंख दिखाती रही। हर परेशानी, हर ठोकर को उसने सीखने का जरिए बना लिया। आज देश की वो बेटी सफलता के उस मुकाम पर है जहां पहुंचने के लिए हाथ-पैर वाले सक्षम इंसानों की हिम्मत जवाब दे जाती है।
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कामयाबी की ये कहानी सुपरवोमेन माधवी लता प्रतिगुदुपु की है। माधवी आज नेशनल पैरालंपिक स्विम्मिंग चैंपियन हैं। भारत की व्हीलचेयर बास्केटबॉल फेडरेशन की अध्यक्ष हैं। तमिलनाडु के पैरालिम्पिक्स स्विमिंग एसोसिएशन की महासचिव हैं। स्कोप इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड की एसोसिएट वाइस प्रेसीडेंट के साथ-साथ एक एनजीओ 'यस वी टू केन मूवमेंट' भी चलाती हैं।
माधवीं की कहानी से केवल बच्चियां, लड़कियां या महिलाएं ही नहीं सीख सकतीं, बल्कि वो हर इंसान सीख सकता है जिसके दिल में देश-समाज और खुद के प्रति कुछ कर गुजने का जज्बा है, जुनून है।
आगे की स्लाइड में पढ़िए पूरी सक्सेस स्टोरी।
हमेशा हालातों से लड़ीं, लेकिन हार नहीं मानी
घरवालों ने दिया साथ
- फोटो : hersaga.com
आज के तेलंगाना के गांव सतुपल्ली में माधवी पलीं-बढ़ीं। बचपन से ही सामाजिक भेदभाव, बुराईयों और असमानता के खिलाफ बागी रहीं और जंग लड़ती रहीं। इस काम में उनकी प्रेरणा उनका परिवार ही रहा। पिता हेडमास्टर थे। मां गृहणी थीं। घर में पांच बच्चे थे जिनमें माधवी सबसे छोटी थीं। माधवी की मां हमेशा अपने सभी बच्चों को खूब पढ़ाना चाहती थीं, इसलिए उनको हर कदम पर प्रेरित करती रहीं और प्रयास करती रहीं।
माधवी ऐसी जगह से थीं जहां कक्षा सातवीं के बाद लड़कियों के पढ़ने पर मनाही थी। ज्यादा हुआ तो हाईस्कूल कर लिया। ऐसे माहौल में माधवी के पिता और भाई ने उनका खूब साथ दिया। वे उन्हें अपने साथ स्कूल लाते और ले जाते। माधवी के पिता चाहते थे कि उनकी बच्ची आगे चलकर आर्थिक तौर पर भी आत्मनिर्भर बने ताकि किसी पर बोझ बनकर न रहे।
दसवीं के बाद माधवी की शारीरिक अक्षमता को देखते हुए स्कूल ने भी आगे पढ़ाई के लिए हाथ खड़े कर लिए। उन्हें घर पर ही पढ़ाई करनी पड़ी। माधवी पढ़ने में अच्छी थीं ही, 12वीं फर्स्ट क्लास में पास की। साथियों संग पास होने की खुशियां मनाना चाहती थीं लेकिन स्कूल न जाने की मजबूरी भी थी। माधवी ने तय कर लिया कि कुछ ऐसा करेंगी कि उनके साथी उन्हें मिलने घर पर दस्तक दें। माधवी ने अपने से एक साल जूनियर साथियों को घर पर गणित की ट्यूशन देनी शुरू कर दी।
पढ़ने में होशियार थीं, बैंक में नौकरी की
एक बदमाश डॉक्टर को सिखाया सबक
- फोटो : hersaga.com
गणित, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और इतिहास के साथ माधवी ने एमएससी. में अप्लाई कर दिया और विशेष लोगों के लिए आरक्षित एलआईसी की नौकरी के लिए भी आवेदन दे दिया। परीक्षा की तैयारी की लेकिन देखा कि जो लोग पढ़ाई में कमजोर थे उन्हें परीक्षा का हॉल टिकट मिल रहा था, लेकिन उन्हें नहीं मिल रहा था। बाद में पता चला कि वहां पैरों से अक्षम लोगों के लिए कोई नौकरी ही नहीं थी। उन्हें टाइपिंग की जॉब के लिए पूछा गया। माधवी को टाइपिंग नहीं आती थी लेकिन उन्होंने टाइपिंग सीखने की भी ठान ली और व्यवस्थित तरीक से सीखना शुरू कर दिया। इसमें भी माधवी अव्वल रहीं।
उसी दौरान माधवी ने बैंकों में नौकरी ढूंढ़ना शुरू किया। माधवी ने स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद की लिखित परीक्षा पास की। साक्षात्कार भी निकाला। नौकरी के लिए चयनित हो गयीं। हैदराबाद में ज्वाइनिंग के लिए उन्हें मेडिकल टेस्ट से गुजरने के लिए कहा गया। जिस दिन उन्हें जॉब ज्वाइन करने के लिए हैदराबाद के लिए निकलना था उसके ठीक एक दिन पहले एक टेलीग्राम मिला। टेलीग्राम नौकरी के सिलसिले में ही था। खबर बुरी थी। बताया गया कि मेडिकल टेस्ट के आधार पर नौकरी के लिए वो फिट नहीं थीं।
एक पीडियाट्रीशियन (हेड ऑफ मेडिकल बोर्ड) ने बिना ऑर्थोपेडिक की सलाह के ये फैसला किया था इसलिए किसी के गले नहीं उतरा। माधवी ने इस तिरस्कार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वो हैदराबाद गयीं। ऑर्थोपेडिक से मिलीं और अपने पक्ष में सही रिपोर्ट पेश की। वो चाहतीं तो इस मामले में कंपनी और उस डॉक्टर के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा कर देतीं और न्यायिक फैसला उनके पक्ष में ही हो जाता।
लेकिन उनकी पहल काम आई। माधवी का फिर से मेडीकल टेस्ट हुआ जिसमें सफलता मिली और नौकरी भी। करीब 15 साल तक माधवी ने स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद में नौकरी की। इस दौरान वो कई गांवों-कस्बों में रहीं। चेन्नई के स्कोप इंटरनेशनल से जुड़ने से पहले उन्होंने एक फुटबाल खरीदी और व्हीलचेयर से फुटबॉल खेलने की जमकर प्रेक्टिस की। माधवी के मुताबिक फुटबॉल खेलना उनके लिए एक अतुल्यनीय स्वतंत्रता के समान था। साल 2004 में माधुरी ने हाथों से चलने वाली कार खरीदी।
माधवी की कहानी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा
- फोटो : hersaga.com
माधुरी ने जब हैदराबाद से चेन्नई की ओर रुख किया तो बहुत सी चीजों को उन्होंने मिस किया। उन्होंने हैदराबाद के लोग, साथी, वहां की बोली सबको मिस किया। सरकारी नौकरी से प्राइवेट सेक्टर में हाथ आजमाना हालांकि काफी रिस्की था लेकिन माधवी हमेशा चुनौतियों से लड़ती आई थीं इसलिए नए काम में हाथ डाल ही दिया। माधवी ने एक एनजीओ 'यस वी टू केन मूवमेंट' खड़ा किया। एनजीओ विशेष लोगों की मदद करती है। माधुरी की मानें तो उनके जैसे लोगों को हमदर्दी नहीं बल्कि समाज में बराबर का सम्मान चाहिए। वो चाहती हैं कि सरकार उनकी तरह तमाम जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आए और उन्हें आत्म निर्भर बनने में मदद करे ताकि वे सम्मान और मर्यादा के साथ जी सकें।
साल 2007 माधवी के लिए मनहूस साबित हुआ जब माधवी को पोस्ट पोलियो अटैक पड़ गया। माधवी सो नहीं पाती थीं। रीढ़ की हड्डी और कमर ने पूरी तरह जवाब दे दिया और डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। एक रास्ता था सर्जरी का था, जिसके सफल होने के चांस न के बराबर थे। माधवी को चेन्नई के ही एक फिजियोथेरेपिस्ट के पास भेजा गया। ये और कोई नहीं बल्कि माधवी का स्टूडेंट था जब वे घर में रहने के दौरान उसे ट्यूशन पढ़ाती थीं। आनंदा जोती ने माधवी को हाइड्रोथेरेपी (जल चिकित्सा) करने की सलाह दी। जल चिकित्सा माधवी के लिए नया जीवन साबित हुई। शुरू में तो ट्रेनर न मिलने पर माधवी ने खुद पानी में उतरने की कोशिश की लेकिन बाद में एक कोच मिल गया जिसने उन्हें पानी में तैरना और तमाम व्यायाम सिखाए।
यहां से माधवी न सिर्फ ठीक हो गयीं बल्कि तैरने के कॉम्पटीशन में भी हाथ आजमा दिया। सबसे पहले साल 2010 में चेन्नई में कॉरपोरेट ओलंपियाड तैराकी की, इसमें माधवी ही अकेली अपनी तरह की तैराक थीं।
इसके बाद साल 2011 में कॉरपोरेट स्पोर्ट्स ओलंपियाड की 100 मीटर तैराकी में माधवी कांस्य पदक लाईं। इसके बाद तो जैसे पदकों की झड़ी लग गई। माधवी ने नेशनल पैरालंपिक स्वीम्मिंग चैंपियनशिप में देश-विदेश में अब तक 10 गोल्ड, 3 सिल्वर, 5 कांस्य समेत कुल 18 पदक अपने नाम किए हैं। तैयारी अब 2017 की है। जून 2017 में कनाडा में व्हीलचेयर बास्केटबॉल वर्ल्ड चैंपियनशिप होनी है। उसकी तैयारी के लिए जनवरी 2017 बैंकॉक में होने वाले एशिया ओशियाना जोनल लेवल क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में एक टीम भेजने का प्लान हो रहा है।
फिक्की में माधवी के भाषण से प्रेरित होकर स्पोर्ट्सक्राफ्ट इंक ने दिल्ली और चेन्नई में पैराशूटिंग कैंप लगाने की बात कही है। माधवी की कामयाबी की दास्तान के लिए शब्द कम पड़ते हैं। माधवी कहती हैं कि जो दिल में है वो कर डालों, लोग आपकी मदद करेंगे। माधवी कहती हैं कि आज वे जीवन के हर पल का लुत्फ ले रही हैं।
माधवी को हमारी ओर से भी ढेरों शुभकामनाएं। आपको माधवी की कहानी कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में प्रतिक्रिया देना न भूलें। चाहें तो शेयर भी कर सकते हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग माधवी की कहानी से प्रेरणा ले सकें।